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नुसरत फ़तह अली ख़ान… तुम बहुत याद आते हो

16 अगस्त 1997 को महज़ 48 बरस की उम्र में इंतिक़ाल कर जाने वाले और फ़न-ए-क़व्वाली और क्लासिकी मूसीक़ी को नई जिहतों से मुतआरिफ़ करवाने वाले उस्ताद नुसरत फ़तह अली ख़ान की यादें आज भी उन के चाहने वालों के दिलों में ज़िंदा हैं।

16 अगस्त 1997 को महज़ 48 बरस की उम्र में इंतिक़ाल कर जाने वाले और फ़न-ए-क़व्वाली और क्लासिकी मूसीक़ी को नई जिहतों से मुतआरिफ़ करवाने वाले उस्ताद नुसरत फ़तह अली ख़ान की यादें आज भी उन के चाहने वालों के दिलों में ज़िंदा हैं।

गुज़शता सदी के आख़िरी हिस्से को अपने सेहर में लिए रखने वाले उस्ताद नुसरत फ़तह अली ख़ान 13 अक्तूबर 1948 को फैसलाबाद में पैदा हुए। उन के वालिद उन्हें डाक्टर या इनजीयनर बनाना चाहते थे लेकिन नुसरत के सामने तो एक और ही दुनिया तसख़ीर की मुंतज़िर थी। नुसरत फ़तह अली ख़ान ने इस हवाले से एक मर्तबा बताया था, मेरे वालिद की ख़ाहिश थी कि में फ़न्ने मूसीक़ी से आगाही तो ज़रूर हासिल करूं लेकिन उस को पेशे के तौर पर ना अपनाऊं। वो मुझे डाक्टर बनाना चाहते थे।

साज़-ओ-आवाज़ से नुसरत की रूह और दिल की हम आहंगी ही के बाएस सुनने वाले उन के कलाम में खो जाया करते हैं। उस की मिसाल मारूफ़ शायर जावेद अख़तर कुछ यूं पेश करते हैं, नुसरत फ़तह अली ख़ान अपने काम में इस क़दर मगन हो जाया करते थे कि वो उस का हिस्सा महसूस होते थे। मेरी ग़ज़लों की एलबम संगम की एक ग़ज़ल जिस के बोल थे, अब क्या सोचें, क्या होना है, जो होगा, अच्छा होगा की रिकार्डिंग के दौरान वो रोते रहे और रिकार्डिंग करवाते रहे।

नुसरत फ़तह अली ख़ान के साथ बहुत सी नशिस्तें रखने और ग़ैर मुल्की सफ़र करने वाले पाकिस्तानी शायर अमजद इस्लाम अमजद कहते हैं कि नुसरत फ़तह अली ख़ान पर जैसे ही ख़्यालात वारिद होते, वो अचानक हारमूनियम अपनी तरफ़ खींचते और उन की उंगलियां इस पर रक़्सां हो जातीं।

नुसरत फ़तह अली ख़ान अपने काम में यकताई की वजह से पाकिस्तान और भारत ही नहीं बल्कि मग़रिबी दुनिया-ए- मूसीक़ी की भी ज़रूरत बने हुए थे। अगस्त 1997 में उन की नागहानी वफ़ात ने सभी को सोगवार कर दिया। पाकिस्तान के सफ़े अव्वल के अदाकार मुस्तफा क़ुरैशी ने इस हवाले से कुछ इन ख़्यालात का इज़हार किया, नुसरत फ़तह अली ख़ान की वफ़ात से सिर्फ़ पाकिस्तान ही का नुक़्सान नहीं हुआ बल्कि उन की मौत पूरी दुनिया-ए- मूसीक़ी के लिए एक बड़ा नुक़्सान था। उन्हों ने फ़ने क़व्वाली को दुनिया के सभी ख़ितों में मक़बूल किया

नुसरत फ़तह अली ख़ान ने अपने पीछे आरिफ़ाना कलाम ,गीतों, ग़ज़लों और क़व्वालियों का इतना बड़ा ख़ज़ाना छोड़ा है कि ये मूसीक़ी में रूह की ग़िज़ा तलाश करने वालों को एक तवील अर्से तक सैर करता रहेगा। उन के जाने का ग़म उन के चाहने वालों के लिए पहले रोज़ की तरह आज भी ताज़ा है।

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