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नोटबंदी की वजह से बेरोज़गार हुए फैक्ट्री वर्कर्स बर्तन धोने को मजबूर

नई दिल्ली : नोटबंदी के बाद  कई फैक्ट्रियां बंद हो जाने की वजह से कई वर्कर्स को फैक्ट्री से निकाला जा रहा है | लगभग 1800 फैक्ट्री  पश्चिमी दिल्ली में इंडस्ट्रियल एरिया मायापुरी में हैं। इन  फैक्ट्रियों में जूते, गाड़ियों के इंजन से लेकर हर चीज बनती हैं| प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ओर से आठ नवंबर को नोटबंदी के ऐलान के बाद से फैक्ट्रियों में बनने वाले सामान की डिमांड कम हो गई है | जिसकी वजह से कई फैक्ट्रियां बंद कर दी गई हैं, वहीं कई फैक्ट्रियों से लोगों को निकाल दिया गया है| ऐसे में इन फैक्ट्रियों में काम करने वाले लोग अब दूसरे काम करने को मजबूर हैं|

30 वर्षीय गुलाब सिंह  को 12 नवंबर को नौकरी से निकाल दिया गया था  | वह क्रश मेटल स्क्रैप फैक्टरी में पावर प्रेस पर बतौर हेल्पर काम करते थे | सिंह अभी चिकन शॉप चलाते हैं। उन्होंने बताया कि बताया मैंने नौकरी से निकालने जाने के बाद फैक्ट्री के मालिक को फोन किया था| उन्होंने कहा कि अभी उनके पास  मुझे नौकरी देने लायक काम नहीं है। मायापुरी में दूसरी फैक्ट्रियों में भी नौकरी नहीं है | जो पैसे दिए जा रहे हैं वह वह कम से कम मजदूरी से आधा कर दिया गया | उन्होंने बताया कि मैंने फैसला किया कि अपने कमरे में  4000 रुपए से अपनी दुकान शुरू की जाए |जिसके बाद उन्होंने पुराने पिंजरे खरीदकर अपना काम शुरू कर दिया| वह अभी 200 रुपए प्रतिदिन कमा लेते हैं|

 

एक चप्पल बनाने की फैक्ट्री में काम करने वाले 20 साल के शिवकुमार को आठ नंवबर के बाद 80 अन्य लोगों के साथ निकाल दिया गया | फैक्ट्री में थ्रेड कटर का काम करने वाले कुमार अब एक बैंक्वेट हॉल में बर्तन धोने को मजबूर हैं | कुमार अभी एक दिन में 200 से 400 बर्तन साफ करते हैं| जिसके लिए  उन्हें 7000 रुपए महीने के मिल रहे हैं| कुमार के मुताबिक़ उनके पिछले काम की तुलना नहीं की जा सकती| उनका कहना है कि यहां पर काम करना अच्छा और बुरा दोनों है। कई बार उनके मैनेजर गुस्सा भी हो जाते हैं| पार्टियों में आने वाले मेहमानों के बर्ताव कुमार को बहुत हैरानी होती है | उनका कहना है कि कई बार तो गेस्ट थप्पड़ भी मार देते हैं| अच्चा इसलिए है कि पार्टी के बाद बचा हुआ खाना मिल जाता है | उन्होंने बताया कि पार्टी देर रात तक चलती है ऐसे में हम लोग 16 घंटे काम करने के बाद सुबह चार बजे घर पहुंचते हैं|
कुमार को नौकरी पर रखने वाले कॉन्ट्रेक्टर मनीष ने बताया कि उनके पास करीब 100 लोगों का स्टाफ है|  लेकिन कुमार का कहना है कि कई अस्थाई कर्मचारी भी हैं, जो  केवल बर्तन धोने और प्लेट उठाने के लिए रखे जाते हैं|  उन्होंने बताया कि ‘शादी का मौसम खत्म होने की वजह से ठेके पर हायर किए गए कुमार जैसे कर्मचारियों का बकाया चुका दिया गया है |  उन्होंने कहा कि हम लोग एक महीने के लिए बंद कर रहे हैं |  हम उन्हें दोबारा उस वक्त हायर कर लेंगे जब  जनवरी में कुछ और शादियां होंगी |
सबसे ज्यादा फैक्ट्रियों में महिला वर्कर्स पर नोटबंदी से नौकरी जाने का असर पड़ा है| अब दूसरा काम ढूंढ़ना उनके लिए  थोड़ा मुश्किल है|  जहां से शिवकुमार को हटाया गया था उसी फैक्ट्री से 50 साल की गुड्डी देवी को निकाल दिया गया | सात साल से  गुड्डी उस फैक्ट्री में काम कर रही थीं| उनका 18 साल का बेटा बिरजू भी तीन साल पहले इसी फैक्ट्री में काम करने लगा|  लेकिन बिरजू के पास स्पेशल स्किल होने की वजह से नोटबंदी के बाद भी उन्हें नौकरी से नहीं हटाया गया|  देवी का कहना है कि महिलाओं को पुरुषों की बजाय कम सैलेरी मिलती है। क्यूंकि महिलाओं को फैक्ट्रियों में केवल बेसिक काम ही दिया जाता है | देवी ने बताया कि फैक्ट्रियों से ज्यादातर  महिलाओं को निकाला गया है|  देवी ने नौकरी के बाद सब्जियों का ठेला लगाने की कोशिश की लेकिन उन्हें जगह नहीं मिली | उन्हें पुलिस की ओर से मांगे जाने वाले वीकली हफ्ते का डर भी उन्हें था | उन्होंने बताया कि कई लोग से नौकरी छूटने के बाद से वापस अपने घर यूपी और बिहार चले गए|

चाइनीज मोबाइल फैक्ट्री में 25 साल के ऋषि लाइन सुपरवाइजर के तौर पर काम करते थे | 25 नवंबर को फैक्ट्री बंद कर दी गई |  सोनी ने बताया कि मालिक ने सभी कर्मचारियों से वादा किया है कि वे मार्च में दोबारा फैक्ट्री खोलेंगे और उन्हें नौकरी देंगे |  सोनी ने अब  सुभाष नगर मार्केटम में मोमोज की स्टॉल लगाना शुरू कर दिया | पहले वे फैक्ट्री में 500 रुपए प्रतिदिन कमाते थे, अब वे 300 रुपए कमाते हैं| उन्होंने बताया कि मैंने दो साल तक सीखने के बाद एक हेल्पर से लाइन सुपरवाइजर बन गया |  जिसके बाद बाद मेरे अंडर में 40 हेल्पर थे |लेकिन अब मैं मोमोज बेच रहा हूं|  हालांकि, ये थोड़ा परेशान करने वाला है, लेकिन क्या किया जा सकता है |  पहले वे फैक्ट्री में 500 रुपए प्रतिदिन कमाते थे, अब वे 300 रुपए कमाते हैं|

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