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पसमानदा अक़लियत बंट गए तो लालू हट गए!

पटना : बिहार की सियासत से लालू प्रसाद का करीब 20 सालों का तिलिस्म तभी टूटा था, जब नीतीश कुमार ने पसमनदों के वोट में सेंध लगा दी थी। इस बार दोनों फिर मुत्तहिद हैं। ऐसे में अज़ीम इत्तिहाद के एक्शन पर सभी नज़र है।

नीतीश का एजेंडा तरक़्क़ी है, लेकिन लालू प्रसाद जमात पर ज़ोर दे रहे हैं। वह सियासी रफ्तार को 1990 के दिहाई की तरफ मोड़ने की कोशिश में हैं। हर ऐसे मुद्दे क पकड़कर फ्लैश कर रहे हैं जिसमें समाजी इंसाफ के बहाने जातियों की गोलबंदी का एजेंडा भी शामिल है।

लालू ने जून में ज़मीन अराजी बिल का मुखालिफत किया और पटना में अपनी जमात के लोगों को बुलाकर गांधी मैदान से गवर्नर हाउस तक मार्च किया। लालू के इस कोशिश में गरीब गुरबे और किसानों को गोलबंद करने का एजेंडा था।

नस्ली मरदम शुमारी के खुलासे के मुद्दे पर लालू ने जंग छेड़ दी। उन्हें लगता है की इस मुद्दे पर हंगामा खड़ा करके वोटरों को वह 15 बनाम 85 फीसद में तक़सीम करने में कामयाब हो जाएँगे।

इंतिखाब में पसमानदा और अक़लियत दलित गोलबंद हो जाएगी। बाइरून मुल्कों में जमा ब्लैक मनी लाने के मुद्दे पर भी लालू का मुस्तईल होना इसी मकसद से है। लालू प्रासाद के अहम पार्टनर नीतीश कुमार की सीधी लड़ाई बीजेपी से है। अपने 10 सालों की इक्तिदार में बिहार में तरक़्क़ी हुआ है, इससे बीजेपी को भी इंकार नहीं, मगर लालू से दोस्ती के बाद नीतीश की कुंडली जंगल राज से मिलाई जा रही है। बीजेपी की कोशिश लालू के बाहने नीतीश को घेरने की है।

उधर लालू के लफ्जों में जंगल राज का मतलब दलितों और पसमानदा का तरक़्क़ी है। वह इसी हिसाब से अपने हिमायतों को समझा रहे हैं की बीजेपी नहीं चाहती की लालू के हक़ में ज़ाती का नाम पर गोलबंद हो। ऐसे में बिहार की सियासत 90 के दिहाई की तरफ लौट दिख रही है। बिहारी इज्ज़त और बेइज़्ज़त के मुद्दे को नीतीश कुमार भी गाँव वालों को समझाने की कोशिश कर रहे हैं। गाँव में भी डीएनए देस्त का मतलब बतलाया जा रहा है ।

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