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पांच साल बाद किया था वालिद का तदफीन: गुलजार

नई दिल्ली, १४ नवंबर: नगमा निगार-शायर व फिल्म साज़ गुलजार ने एक किताब में इस बात का खुलासा किया है कि वह अपने वालिद के तदफीन में शरीक नहीं हो सके थे और कई सालों तक यह टीस उन्हें सालती रही। आखिरकार पांच साल बाद फिल्म साज़ बिमल रॉय के तदफीन

नई दिल्ली, १४ नवंबर: नगमा निगार-शायर व फिल्म साज़ गुलजार ने एक किताब में इस बात का खुलासा किया है कि वह अपने वालिद के तदफीन में शरीक नहीं हो सके थे और कई सालों तक यह टीस उन्हें सालती रही। आखिरकार पांच साल बाद फिल्म साज़ बिमल रॉय के तदफीन के साथ उन्होंने अपने वालिद को भी ‘आखिरी विदाई’ दी थी और यह यकीन किया था कि वालिद अब दुनिया में नहीं रहे।

सहाफी जिया उस-सलाम की किताब ‘हाउसफुल : द गोल्डन इयर्स ऑफ बॉलीवुड’ में गुलजार ने मन के सफे खोलते हुए कहा, ‘जब दिल्ली में मेरे वालिद का इंतेकाल हुआ, मैं स वक्त मुम्बई में बिमल दा के यहां बतौर असिस्टेंट काम कर रहा था। मेरे घर वालो ने मुझे इत्तेला नहीं दी।

मेरे बड़े भाई मुंबई में ही मुकीम थे और वालिद के इंतेकाल की खबर पाकर फ्लाइट से उसी दिन निकल गए।’ गुलजार के मुताबिक, ‘ मेरे वलिद के इंतेकाल की खबर मुझे मेरे पड़ोसी ने दी । मैं फौरन ट्रेन पकड़ कर भागा। उन दिनों फ्रंटियर मेल दिल्ली के लिए सबसे तेज ट्रेन थी, जो 24 घंटे में पहुंचाती थी। जब तक मैं घर पहुंचा सब निपट चुका था।’

गुलजार को अपने वालिद के तदफीन में शामिल न होने का अफ्सोस हमेशा परेशान करता रहा। उन दिनों वे मुंबई में जद्दो जेहद कर रहे थे। उन्होंने कहा, ‘मैं दिल में खालीपन लिए लौटा। मैं वालिद के तदफीन (अंतिम संस्कार) में नहीं था। इसलिए वह मेरे लिए मर कर भी जिंदा थे।

मेरे दिल पर एक भार था।’ गुलजार ने बताया, ‘पांच साल बाद बिमल दा कैंसर से लड़ रहे थे। मैं हर रात उनके पास बैठ कर रोता था। उनकी पसंदीदा स्क्रिप्ट ‘अमृत कुंभ’ पढ़कर सुनाता। आठ जनवरी, 1966 को जब उनका इंतेकाल हुआ, तो हमने उनका तदफीन किया और उनके साथ ही मैंने अपने वालिद को भी अंतिम विदाई दी। उनका ‘तदफीन’ किया।’

76 साला गुलजार ने फिल्म ‘बंदिनी’ (1963) में सबसे पहले बिमल रॉय के साथ काम किया था। उनका पहला नगमा था ‘मोरा गोरा रंग…’। गुलजार की ख्वाहिश थी कि यह नगमा वह खुद बिमल रॉय को सुनाएं, लेकिन मूसीकार एसडी बर्मन ने रोक दिया था। उन्हें डर था कि कहीं गुलजार की आवाज और अंदाज में यह गीत सुनकर बिमल रॉय का मिज़ाज न बिगड़ जाए।

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