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पाकिस्तान असेंबली में अफ्रीकी मूल की पहली महिला तंज़ीला शीदी

तंज़ीला शीदी, पाकिस्तान असेंबली में क़दम रखने वाली अफ़्रीकी मूल की पहली महिला होंगी.

सिंध असेंबली में तंज़ीला ये ख़्वाब लेकर दाख़िल होंगी कि उनकी आने वाली पीढ़ियों के लिए ‘शीदी’ शब्द अपमान का नहीं बल्कि इज़्ज़त का शब्द समझा जाए.

पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी ने तंज़ीला को महिलाओं के लिए आरक्षित सीट से मनोनीत किया है. उनका संबंध ज़िला बदीन के शहर मातली से है.

शीदी और पीपुल्स पार्टी

तंज़ीला का कहना है कि उनके समुदाय में बच्चा जब बोलना और चलना शुरू करता है तो वो ‘दिलां तीर बजा’ पर झूमता है. शीदी कहीं भी हो वह पीपुल्स पार्टी को पसंद करता है.

ख़ुद को असेंबली के लिए मनोनीत किए जाने को वो शीदी समुदाय को पहचान दिए जाने से जोड़कर देखती हैं.

“ये पहचान पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के प्रमुख बिलावल भुट्टो ज़रदारी ने दी वरना शीदियों की कहीं गिनती नहीं होती थी. किसी को पता ही नहीं था कि पाकिस्तान में शीदी भी रहते हैं.”

“जिस तरह कोलंबस ने अमरीका की खोज की थी, बिलावल भुट्टो ने हमें खोजा है.”

कहां से आए शीदी?

ब्रितानी राज में व्यापार के लिए अफ़्रीका से काले ग़ुलाम लाए जाते थे. ब्रितानी संसद ने 1833 में ग़ुलामी ख़त्म करने का क़ानून पास किया था. 10 साल बाद भारत में भी पाबंदी लागू हो गई और काले ग़ुलामों को आज़ादी मिली.

तंज़ीला बताती हैं कि ‘पूरब में पाबंदी के बाद तंज़ानिया से काले ग़ुलामों को पानी के जहाज़ों में दूसरे इलाक़ों में भेज दिया जाता था. आज के पाकिस्तान में उनकी आबादी समुद्र के क़रीबी इलाक़ों में नज़र आती है.’

शीदी समुदाय के उस्ताद सादिक़ मुसाफ़िर शीदी ने अपनी किताब ‘ग़ुलामी और आज़ादी के इबरतनाक नज़ारे’ में शीदियों की खोज की कोशिश की. उन्हें उनके पिता गुलाब ने बताया था कि वो कैसे यहां पहुंचे.

तंज़ीला के मुताबिक़, ‘उनके पिता अब्दुल बारी एडवोकेट ने कोशिश की थी कि वो ये पता लगा सकें कि वो कहां से आए थे. आख़िर में सब इस बात पर सहमत थे कि उन्हें तंज़ानिया से लाया गया था.’

अफ़्रीका से रिश्ता

तंज़ीला के ख़ानदान ने आज भी ख़ुद को अपने मूल अफ़्रीकी देश से जोड़े रखा है.

उनके पिता सिंध विश्वविद्यालय जाकर अफ़्रीकी छात्रों से मिलते थे जबकि बाद में उनकी बड़ी बहन की शादी तंज़ानिया के पोंज़ा क़बीले में की गई.

इस शादी पर शीदी मोहल्ले में पाकिस्तानी शीदी और अफ़्रीकी शीदी मोगो (ड्रम बीट) पर इस तरह झूम रहे थे कि पहचान पाना मुश्किल हो गया था कि पाकिस्तान के शीदी कौन-से हैं और अफ़्रीकी शीदी कौन से. इसी तरह दूसरी बहन की शादी घाना में स्पोग क़बीले में हुई.

भेदभावपूर्ण व्यवहार

सिंध में शीदी समुदाय आर्थिक और सामाजिक तौर पर पिछड़ा और भेदभाव का शिकार रहा है.

तंज़ीला कहती हैं “हमें समाज में जगह बनाने में बहुत वक़्त लगा. हालांकि शीदी इसके लिए तीन सदियों से कोशिश करते रहे. हम सभ्य हो गए, शिक्षा भी आ गई, कुछ लोग डॉक्टर, इंजीनियर और शिक्षक भी बन गए. हमने ख़ुद को बदल लिया.”

“हम जो चंद सिक्कों के बदले में ख़रीदकर लाए गए थे, उन्होंने अपने आप को तो बदल लिया, ज़मीन ने प्यार भी दे दिया लेकिन कुछ ख़ास तबक़े की सोच अब भी नहीं बदली है. शीदी हमारे लिए गाली बनती जा रही थी. हमें इस तरह से बुलाया जाता था जैसे शीदी हमारी पहचान नहीं गाली हो.”

पीपुल्स पार्टी में बग़ावत

तंज़ीला ने कम्प्यूटर साइंस में मास्टर की डिग्री ली है. वो मातली से काउंसलर रही हैं जबकि बाद में उन्हें म्युनिसिपल चेयरमैन के लिए नामांकित किया गया.

“जब मुझे म्युनिसिपल चेयरमैन के लिए नामांकित किया गया तो एक ख़ास सोच का ये कहना था कि ये महिलाएं जो सिर्फ़ बर्तन मांजने और झाड़ू लगाने के लिए हैं, ये चेयरमैन बनेंगी? ये तो हमारे ग़ुलाम रहे हैं हमारा नेतृत्व कैसे कर सकते हैं.”

तंज़ीला कहती हैं कि इस सोच से लड़ना उनके लिए बड़ा चुनौतीपूर्ण था.

वो कहते हैं, “किसी से शारीरिक तौर पर लड़ना आसान होता है, आप हथियार ख़रीद सकते हैं लेकिन सोच से लड़ना बहुत मुश्किल है.”

लेकिन पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी ने तंज़ीला का साथ दिया.

तंज़ीला हर दिन अपने पड़ोस के मैदान में बैठक करती हैं. वो मानती हैं कि उन पर बहुत ज़िम्मेदारी है.

तंज़ीला के मुताबिक़,”हमें शीदी उस वक़्त पुकारा जाता था जब हमारा अपमान करना होता था. मेरा ख़्वाब है कि जब शीदी कहकर पुकारा जाए तो सम्मान मिले. कल चार बच्चों में बैठे हुए किसी बच्चे को शीदी कहकर बुलाया जाए तो वह सम्मान महसूस करे, अपमान नहीं.”

साभार- बीबीसी

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