पाकिस्तान- क्रांतिकारी कवि हबीब जालिब की बेटी आजीविका के लिए चला रही टैक्सी

पाकिस्तान- क्रांतिकारी कवि हबीब जालिब की बेटी आजीविका के लिए चला रही टैक्सी
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पाकिस्तान के क्रांतिकारी कवि हबीब जालिब की बेटी आजीविका के लिए टैक्सी चल रही हैं. पाकिस्तान में पंजाब प्रांत की सरकार से मां को मिलने वाली पेंशन 2014 में बंद किए जाने के बाद ताहिरा हबीब जालिब को टैक्सी चलानी पड़ रही है.

जियो टीवी की एक रिपोर्ट के मुताबिक ताहिरा हबीब जालिब लाहौर के मुस्तफा टॉउन में रहती हैं और रोजी-रोटी के लिए शहर में टैक्सी चलाती हैं. यह मामला उस समय सामने आया जब बुधवार को लाहौर इलेक्ट्रिक सप्लाई कंपनी ने ताहिरा को बिजली का 7,500 रुपये का बिल भेज दिया. जियो टीवी के मुताबिक अपनी बहन और बच्चों के साथ रहने वालीं ताहिरा ने बताया, ‘परिवार में मैं इकलौता कमाने वाली हूं और घर की रोजी-रोटी के लिए टैक्सी चलाती हूं.’

उन्होंने बताया, ‘जो टैक्सी मैं चलाती हूं उसे लोन पर लिया था.’ ताहिरा कहती हैं कि हबीब जालिब की बेटी होने के बावजूद उन्हें टैक्सी चलाने में कोई शर्म नहीं आती है क्योंकि उनके पिता ने मरते दम तक अपने वसूलों से कभी समझौता नहीं किया.

ताहिरा ने बताया कि उनकी मां को 25 हजार रुपये का वजीफा मिलता था, जिसे पंजाब प्रांत की तत्कालीन शहबाज शरीफ सरकार ने 2014 में बंद कर दिया था. सरकार उनकी मां को यह वजीफा कवि कोटे के तहत देती थी. उन्होंने बताया, ‘मेरी मां के निधन से पहले ही सरकार ने यह पेंशन देना बंद कर दिया.’

ताहिरा बताती हैं कि उन्होंने अपनी माली हालत बताते हुए सरकार से दरख्वास्त की कि पेंशन फिर शुरू की जाए क्योंकि उनके परिवार के सामने रोजी-रोटी का संकट है. वह कहती हैं, ‘ये नेता मेरा पिता की नज्मों को अपने भाषणों में इस्तेमाल करते हैं, लेकिन ये उनके परिवार की थोड़ी भी परवाह नहीं करते हैं.’

बता दें कि हबीब जालिब इंसान और इंसानियत के कवि थे. उनका तेवर खालिस इंक़लाबी था. ना हुक्म मानते थे ना झुकते थे. हबीब जालिब को तो हुक्मरानों ने कई बार जंजीरों में जकड़ने की कोशिश की लेकिन उनकी कलम कभी ना जकड़ पाए. वो चलती रही मजबूरों और मजदूरों के लिए, सत्ता के खिलाफ बिना डरे.

हबीब जालिब का जन्म 24 मार्च 1928 को पंजाब के होशियारपुर में हुआ था. भारत के बंटवारे को हबीब जालिब नहीं मानते थे. लेकिन घर वालों की मोहब्बत में इन्हें पाकिस्तान जाना पड़ा. हबीब तरक्की पसंद कवि थे. इनकी सीधी-सपाट बातें ज़ुल्म करने वालों के मुंह पर तमाचा थीं. शायद यही वजह रही कि अदब की दुनिया में हबीब जालिब जैसा मशहूर कोई ना हो सका, कारण इन्हें जनकवि का तमगा जन से मिला किसी अवॉर्ड से नहीं. विभाजन के बाद हबीब जालिब पाकिस्तान चले गए थे और एक उर्दू अखबार में प्रूफ रीडर का काम करते थे. बाद के दिनों में तरक्की पसंद कवि हबीब जालिब पाकिस्तान के सैनिक तानाशाह जनरल अयूब खान के खिलाफ मजबूत आवाज के रूप में जाने गए.

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