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पाकिस्तान में जन्मी भारत की सबसे उम्रदराज़ लेखिका कृष्णा सोबती को मिलेगा ज्ञानपीठ पुरस्कार

साहित्य के क्षेत्र में दिया जाने वाला देश का सर्वोच्च सम्मान ज्ञानपीठ पुरस्कार वर्ष 2017 के लिए हिन्दी की लेखिका कृष्णा सोबती को प्रदान किया जायेगा।

पाकिस्तान में चिनाब नदी के किनारे छोटे से पहाड़ी कस्बे में 18 फरवरी 1925 को कृष्णा सोबती का जन्म हुआ था। वो इस समय हिंदी में जीवित सबसे वयोवृद्ध महिला रचनाकार हैं और शायद सबसे बूढ़ी उपन्यासकार भी। पिछले कुछ समय से बीमार कृष्णा सोबती उम्र के इस पड़ाव में भी अपनी अदम्य जिजीविषा और रचना जीवट के लिए जानी जाती हैं। हाल में उनका एक आत्मकथात्मक उपन्यास आया था, “गुजरात पाकिस्तान से गुजरात हिन्दोस्तान तक।

ज्ञानपीठ के निदेशक लीलाधर मंडलोई ने आज भाषा को बताया कि वर्ष 2017 के लिए दिया जाने वाला 53वां ज्ञानपीठ पुरस्कार हिन्दी साहित्य की सशक्त हस्ताक्षर कृष्णा सोबती को साहित्य के क्षेत्र में उनके उत्कृष्ट कार्य के लिए प्रदान किया जायेगा। उन्होंने बताया कि पुरस्कार चयन समिति की बैठक में कृष्णा सोबती को वर्ष 2017 का ज्ञानपीठ पुरस्कार देने का निर्णय किया गया।

पुरस्कार स्वरूप कृष्णा सोबती को 11 लाख रूपये, प्रशस्ति पत्र और प्रतीक चिह्न प्रदान किया जायेगा।

कृष्णा सोबती को उनके उपन्यास ‘‘जिंदगीनामा’’ के लिए वर्ष 1980 का साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला था। उन्हें 1996 में अकादमी के उच्चतम सम्मान साहित्य अकादमी फैलोशिप से नवाजा गया था।

कृष्णा सोबती के प्रमुख रचनाकर्म में ज़िन्दगीनामा, ऐ लड़की, मित्रो मरजानी और जैनी मेहरबान सिंह शामिल है।

दक्षिण एशियाई फलक पर अगर साहित्य में देखें तो कुरर्तुलएनहैदर, इस्मत चुगताई, अमृता प्रीतम जैसी दिग्गज पूर्ववर्ती लेखिकाओं से अलग, कृष्णा सोबती अपनी रचनाओं में एक विशिष्ट संवेदना, मुहावरे और बहुत स्थानिक पर्यावरण की खुशबू संजोए, हमें उद्वेलित, विचलित और रोमांचित करती हैं।

लेखन से इतर सामाजिक जीवन में भी कृष्णा सोबती सक्रिय और मुखर रही हैं। 90 पार की उम्र में अस्वस्थता के बावजूद 2015 में कृष्णा सोबती ही थी जिन्होंने हिंदी साहित्यिक बिरादरी की ओर से देश में असहिष्णुता के खिलाफ आवाज उठायी थी और कड़े शब्दों में धार्मिक कट्टरपंथ और हिंसाओं का विरोध करते हुए अपना साहित्य अकादमी अवार्ड वापस कर दिया था।

 

 

 

 

 

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