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पीएचडी के बाद बना चाय वाला, जेएनयू कैंपस में खोला ढाबा

कोई भी काम कम करना हमें हरगिज नहीं आता। पीएचडी करने के बाद जेएनयू कैंपस में मामू ढाबा शुरू करने वाले वाले डॉ. मोहम्मद शहजाद इब्राहिम ने इस जुमले को अपनी जिंदगी में इस कदर उतारा कि आज उनके पास पैसा, शोहरत सब कुछ है।

कोई भी काम कम करना हमें हरगिज नहीं आता। पीएचडी करने के बाद जेएनयू कैंपस में मामू ढाबा शुरू करने वाले वाले डॉ. मोहम्मद शहजाद इब्राहिम ने इस जुमले को अपनी जिंदगी में इस कदर उतारा कि आज उनके पास पैसा, शोहरत सब कुछ है।

पीएचडी चाय वाले के नाम से मशहूर इब्राहिम का मानना है कि जो भी करो, बेहतर करो। उनके विजन को देखते हुए वज़ीर ए आज़म नरेंद्र मोदी की हलफ बरदारी में भी उन्हें मदऊ किया गया था।

इब्राहिम 1993 में जब बिहार के शेखपुरा से दिल्ली आए थे तो उनके नाम के आगे डॉ. नहीं था, लेकिन उनका एक विजन था। जो भी करो, सबसे अच्छा करो। उन्होंने इसे अपने जीवन में इस कदर उतार लिया कि जेएनयू से उर्दू में एमए, एमफिल करने के बाद उन्होंने पीएचडी की।

सहाफियत में डिप्लोमा करने के बाद हैदराबाद में एक मीडिया ग्रुप में करीब दो साल काम किया। फिर दिल्ली में उसी चैनल में नामानिगार रहे। रेडियो में एनाउंसर भी रहे। लेकिन कहीं भी उनका मन नहीं लगा। हमेशा ऐसा लगता था जैसे जेएनयू कैंपस उन्हें बुला रहा है।

इब्राहिम को खाना बनाने-खिलाने का बहुत शौक था। साल 2000 में उन्होंने जेएनयू कैंपस में ही मामू ढाबा शुरू किया। इब्राहिम बताते हैं कि यह मालूम चलते ही उनके गाइड प्रोफेसर नसीर अहमद खान ने कहा, ढाबा ही चलाना था तो पीएचडी क्यों किया। तमाम दोस्तों के इलावा घरवालों को भी इब्राहिम का यह फैसला पसंद नहीं आया। इस बिजनेस का कोई खानदानी तजुर्बा भी नहीं था।

बहुत कम पैसे में शुरुआत की और कामयाबी की सीढि़यां चढ़ते गए। शुरू में कुछ मुश्किलें भी आईं। जैसे कैंपस में पहले से ही मशहूर गंगा ढाबा। फिर भी उन्होंने एक बार कदम बढ़ा दिया तो आज तक बेहतर करते आ रहे हैं।

इब्राहिम को इस बात का मलाल है कि अक्सर हमें दुनिया के हिसाब से चलना पड़ता है। इब्राहिम कहते हैं समोसा हम बनाते हैं, उसकी क्वालिटी हम तय करते हैं, तो उसका दाम हम पड़ोसी दुकानदार के हिसाब से कैसे तय करेंगे। लेकिन हमें ऐसा करना पड़ता है। क्योंकि लोग सिर्फ दाम की बराबरी करते हैं, क्वालिटी की नहीं।

इब्राहिम अपने इस विजन पर काम भी कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि मुझे कई बार नौकरी के आफर मिले, लेकिन बार-बार वही, सबसे बेहतर वाली बात दिमाग में आ जाती। हालांकि मेरी काबलियत के मुताबिक कोई नौकरी मिलती तो उसे करने में मुझे कोई गुरेज भी नहीं था, लेकिन ऐसा हुआ नहीं।

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