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पी एम ओ की सरज़निश

वज़ीर-ए-आज़म का दफ़्तर बहुत सी क़बाहतों में गिरफ़्तार होने के बावजूद यही ब्यान दे रहा है कि 2G स्पेक्ट्रम स्क़ाम में साबिक़ वज़ीर टेलीकॉम ए राजा के ख़िलाफ़ क़ानूनी कार्रवाई करने में इस ने कोई ताख़ीर नहीं की। सुप्रीम कोर्ट ने इस केस के

वज़ीर-ए-आज़म का दफ़्तर बहुत सी क़बाहतों में गिरफ़्तार होने के बावजूद यही ब्यान दे रहा है कि 2G स्पेक्ट्रम स्क़ाम में साबिक़ वज़ीर टेलीकॉम ए राजा के ख़िलाफ़ क़ानूनी कार्रवाई करने में इस ने कोई ताख़ीर नहीं की। सुप्रीम कोर्ट ने इस केस के मुआमला में वज़ीर-ए-आज़म के दफ़्तर की तसाहली का सख़्त नोट लेकर उस की सरज़निश की है।

किसी भी अवामी ख़िदमत गुज़ार की बदउनवानीयों के ख़िलाफ़ कार्रवाई करने के के लिए मुरव्वजा क़वाइद के मुताबिक़ क़दम उठाना होता है। मगर वज़ीर-ए-आज़म के दफ़्तर ने 2G केस के सामने आने के बाद ए राजा के ख़िलाफ़ कोई क़दम नहीं उठाया। सुप्रीम कोर्ट ने इस तरह के एक विनीत नारायण केस में रोलिंग दी थी कि मुक़द्दमा बाज़ी के लिए 3 माह का वक़्त काफ़ी है।

या ज़्यादा से ज़्यादा चार माह के अंदर अवामी ख़िदमत गुज़ार के ख़िलाफ़ शिकायत पर कार्रवाई की जाय मगर ए राजा के मुआमला में ऐसा नहीं हुआ। अगर कोई मजाज़ अथॉरीटी मुक़द्दमा शुरू करने में नाकाम होतो अदालत को पूरा इख़तियार है कि वो ख़ाती के ख़िलाफ़ कार्रवाई की हिदायत दे। दस्तूर हिंद के तहत तमाम शहरीयों को यकसाँ हुक़ूक़ हासिल हैं कि वो अवामी ख़िदमत गुज़ारों की ख़राबियों के ख़िलाफ़ कार्रवाई के लिए ज़ोर दें।

2G स्क़ाम में रास्त तौर पर वज़ीर-ए-आज़म के दफ़्तर (PMO) ने ए राजा के ख़िलाफ़ कार्रवाई की इजाज़त देने में ग़ैरमामूली ताख़ीर की जिस पर सुप्रीम कोर्ट को सख़्त नोट लेना पड़ा। अगर चीका अदालत-ए-आलिया ने इस ताख़ीर के लिए रास्त वज़ीर-ए-आज़म मनमोहन सिंह को ज़िम्मेदार नहीं टहराया है मगर उस वक़्त वज़ीर-ए-आज़म का दफ़्तर उन की ही ख़िदमत में मसरूफ़ है। ख़राबियों या बदउनवानीयों के मुआमला में फ़ौरी ऐक्शन लेना वज़ीर-ए-आज़म के दफ़्तर की ज़िम्मेदारी है।

इस ख़सूस में ताख़ीर से काम लिया गया तो अदालत को ये ज़िम्मेदारी लेनी पड़ी की ख़ातियों के ख़िलाफ़ मुक़द्दमा बाज़ी की राह हमवार की जाय। रिश्वत सतानी के वाक़ियात ने मुआशरा को खोखला कर दिया है। ऐसे में मलिक के अहम ओहदा की ज़िम्मेदारी पूरी करने वाले दफ़्तर PMO की कोताहियों को अदालत में उठाया जाय तो इस से बढ़ कर अफ़सोस की क्या बात होगी कि एक जमहूरी मर्तबा के हामिल दफ़्तर पर क़ानून की जानिब से सरज़निश की जा रही है।

सुप्रीम कोर्ट ने क्रप्शन के मसला का संगीन नोट लिया है। ये लानत दस्तूरी हुक्मरानी की असल रूह को ही मजरूह कररही है। क्रप्शन ने हिंदूस्तानी जमहूरीयत की मज़बूत बुनियादों को ही ख़तरा में डाल दिया है। एक सौ 35 करोड़ की आबादी वाले हिंदूस्तान में जब जमहूरीयत की बुनियादें कमज़ोर हूँ तो कई मसाइल पैदा होंगे। एक अरब से ज़ाइद अब्बा दी वाले मलिक के लिए एक इसे क़ानून पर सख़्ती से अमल करने की ज़रूरत होती है जहां आला ओहदा भी क़ानून के ताबे हो जाय।

जो हुकूमत ईमानदार मुख़लिस और सरगर्म सिवल मुलाज़मीन पर मुश्तमिल नहीं होती वहां ख़राबियों का अंबार खड़ा हो जाता है। क़ानून के नफ़ाज़ का मुआमला हो या बदउनवानीयों के ख़ातमा के लिए मुरव्वजा क़वानीन का इतलाक़ अगर इस में दयानतदाराना काम अंजाम ना दिया जाय तो समाजी इस्लाह और इस पर अमल दरआमद के लिए मज़बूत इरादे भी सर्द पड़ जाते हैं। 2G स्क़ाम की वजह से मुल्क को भारी नुक़्सानात से दो-चार होना पड़ा।

सी बी आई ने इस केस की छानबीन करके ख़ातियों को जेल में डाल दिया लेकिन असल मसला यूं ही बरक़रार है कि रिश्वतखोरी का ख़ातमा किस तरह किया जाय। रिश्वत के ख़िलाफ़ मुहिम चलाने वालों ने लोक पाल और लोक आयुक़्त को मज़बूत बनाने की जद्द-ओ-जहद ही करते रहे लेकिन कांग्रेस ज़ेर क़ियादत यू पी ए हुकूमत ने बददियानती या अदम इख़लास का मुज़ाहरा करते हुए एक मज़बूत लोक पाल लाने में रुकावट पैदा कर दी।

सरकारी मुलाज़मीन हूँ या अवाम की ख़िदमत के लिए मुंतख़ब होने वाले सियासतदां उन की ख़राबियों की जब निशानदेही की जाय तो इस पर फ़ौरी ऐक्शण लेना चाहीए। 2G स्क़ाम के मुआमला में ऐसा नहीं हुआ। ए राजा पर इस्तिग़ासा की कार्रवाई करने के लिए वज़ीर-ए-आज़म को नवंबर 2008 में ही मकतूब लिखा गया था लेकिन इन चार बरसों तक वज़ीर-ए-आज़म का दफ़्तर ख़ातियों को अपने इख़्तयारात के दामन में छिपा कर रखा ये सरासर ग़ैर दस्तूरी और ग़ैर जमहूरी अमल है।

सुप्रीम कोर्ट ने इस ख़ामी की निशानदेही की है। इस के जवाब में अगर PMO अपनी कमज़ोर दलीलों के सहारे मसला को टालने की कोशिश करे तो ये ख़ुद एहतिसाबी से फरारी का बदतरीन मुज़ाहरा कहलाता है। पी ऐम ओ को हुकूमत से ज़्यादा मलिक के मुफ़ादात को नज़र में रखने की ज़रूरत है। इस ने हुकूमत के अरकान की बदउनवानीयों की पर्दापोशी की तो ये अफ़सोसनाक रवैय्या है। इंसाफ़ की नज़र में पी ऐम ओ को सुप्रीम कोर्ट ने ख़ाती तसव्वुर किया है तब ही इसने ए राजा के केस में ताख़ीर से काम लेने पर सरज़निश की है।

एक आम शहरी को ये दस्तूरी हक़ हासिल है कि अवामी ख़िदमत गुज़ार का गिरेबान पकड़ कर सच्चाई और इंसाफ़ के साथ बेहतर ख़िदमत का मुतालिबा करे। जब पी ऐम ओ को 2008 में ही हुकूमत के बाअज़ अरकान की बदउनवानीयों से वाक़िफ़ करवाया गया था तो इस मुआमले में पी ऐम ओ ने इस्तिस्ना सूरत इख़तेयार करके ख़राबी को मज़बूत बनाने का काम किया। ये बदउनवानी इतनी ख़तरनाक होगई है कि उसे हिंदूस्तानी जमहूरीयत के लिए ख़तरा महसूस किया जा रहा है जब मुल़्क की बड़ी अदालत का ये एहसास है कि रिश्वत ने जमहूरीयत को संगीन ख़तरा पैदा किया है तो अवामी ज़िंदगी में कुरप्शन की लानत के ख़ातमा के लिए जंगी बुनियादों पर कार्रवाई करने की ज़रूरत होती है।

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