Thursday , December 14 2017

पुराना पुल दरवाज़े पर नसब यादगार कुतबा को शरपसंदों ने मिटा दिया

अब्बू एमल-हिंदूस्तान दुनिया का सब से बड़ा जमहूरी मुलक है , यहां मुख़्तलिफ़ मज़ाहिब के मानने वाले रहते हैं। ख़सूस कर सरज़मीन दक्कन के बाशिंदगान की यकजहती, भाई चारगी दूसरे की तईं हमदर्दी, ख़ुलूस, ख़ैरख़ाही पूरे मुल्क में अपना मुनफ

अब्बू एमल-हिंदूस्तान दुनिया का सब से बड़ा जमहूरी मुलक है , यहां मुख़्तलिफ़ मज़ाहिब के मानने वाले रहते हैं। ख़सूस कर सरज़मीन दक्कन के बाशिंदगान की यकजहती, भाई चारगी दूसरे की तईं हमदर्दी, ख़ुलूस, ख़ैरख़ाही पूरे मुल्क में अपना मुनफ़रद मुक़ाम रखती है और आज भी ये सिलसिला बदस्तूर जारी है, लेकिन दीगर रियास्तों से आकर आबाद हुए चंद शरपसंदअनासिर की आँखों में यहां की आपसी मुहब्बत-ओ-भाई चारगी शायद कांटे की तरह खटक रही है। तभी तो नित नए तरीक़ा और हरकतें की जा रही हैं ताकि मुख़्तलिफ़ फ़िरक़ों में तनाव और रंजिश पैदा होसके और यहां की यकजहती, इत्तिहाद-ओ-इत्तिफ़ाक़ मिट कर रह जाय। हिंदूस्तान के क़दीम पलों में हैदराबाद का पुराना पुल ख़ास मुक़ाम रखता है और क़ुतुब शाही फ़न तामीर की एक अच्छी यादगार है।

ये पल शहर हैदराबाद को गोलकुंडा से जोड़ने के लिए तामीर किराया गया था क्योंकि गोलकुंडा की जगह आबादी की कसरत की बिना पर तंग महसूस होरही थी। नइ आबादी मशरिक़ की जानिब कसरत से बढ़ने लगी। दूसरी वजह उस की तामीर की ये है कि इबराहीम क़ुतुब शाह के अह्दे हुकूमत में वादी कृष्णा में हीरे की कांयं दरयाफ़त होती थीं, जिन से इतनी कसरत से हीरे बरामद होने लगे कि गोलकुंडा दुनिया भर में हीरों की सब से बड़ी मंडी बन गया, जिन की ख़रीद-ओ-फ़रोख़तके लिए दीगर ममालिक से कसीर तादाद में तजार गोलकुंडा का रुख करने लगे, इन में जो क़ाफ़िले जुनूब की तरफ़ से साहिल मालाबार और मछली बंदर वग़ैरा की तरफ़ से आते, उन को गोलकुंडा आने के लिए मूसा नदी उबूर करनी पड़ती। ये नदी मौसिम-ए-गर्मा में तोपायाब रहती, लेकिन बारिश के मौसम में इस में गुज़रना दुशवार होजाता और नदी उतरने के इंतिज़ार में क़ाफ़िलों को कई कई दिन तक ठहरे रहना पड़ता था।

दूसरी तरफ़ सरकारी आफ़िसरान और अमला शाही का भी आना जाना होता था। इस लिए इन मसाइल के मद्द-ए-नज़र ये पल बनाया गया। इस पुल पर मसारिफ़ तामीर ढाई लाख रुपय आइद हुए थे। पुल के आग़ाज़ तामीर की तारीख़ स्रात अलमुसतक़ीम से निकलती है। पुराने पुल की तामीरइबराहीम क़ुतुब शाह के हुक्म से 981 ह 1573-ए-में शुरू हुई और 986ह 1578-ए-में ख़तम हुई। मुहम्मद क़ुली क़ुतुब शाह 1580-ए-में 15 साल की उम्र में तख़्त नशीन हुए। जब पुल तकमील को पहुंचा तो इस की तारीख़ गुज़र गह माह कही गई। इस के आदाद 986 हैं।अह्द क़ुतुब शाही में इस का नाम निर्वा था। इस पुल का तूल 200 गज़, अर्ज़ 12 गज़ औरबुलंदी 14 गज़ है। इस में 22 कमानें हैं, जो गोथिक तर्ज़ की हैं इस में भी तराशीदा पत्थर इस्तिमाल किए गए हैं।

1820 में मूसा नदी की तुग़यानी के बाद नवाब सिकन्दर जाह बहादुर के अह्द में इस पुल की मुरम्मत हुई थी, जिस की यादगार में महाराजा चन्दू लाल शादां मदार इलहाम वक़्त ने इस के दरवाज़े पर एक कुतबा नसब करलिया था, जिस में लिखा था : बादशाह सिकन्दर शूदा तामीर पुल यकसर, सुई राजा चन्दू लाल अज़ कैअर नय्यर ने मूसा नदी को दरिया लिखा है। इस का ब्यान है कि शहर के जुनूब मग़रिबी किनारे पर ऐनी दीवारों के नीचे एक बड़ा दरिया बहता है, जो ख़लीज बंगाल में जा कर गिरता है। शहर के पास एक संगीन पुल बना हुआ है। जो ख़ूबसूरती में पैरिस के पान उल्फ़ा (जदीद पुल) से कुछ ही कम है। अब मूसा नदी में पानी का बहाॶ तक़रीबन ना होने के बराबर होचुका है। जैसे जैसे नदी सूखती चली गई तो देखते ही देखते यहां मुख़्तलिफ़ मुक़ामात पर एक ही फ़िर्क़ा मगर अलहदा अलहदा बिरादरी से ताल्लुक़ रखने वाले अफ़राद ने अपनी इजारादारी क़ायम करदी। पुराना पुल के आस पास धोबियों का राज चलता है।

तो मुस्लिम जंग के आस पास कबाड़ियों का क़बज़ा है। अदालत-ए-आलिया और नए पुल के क़रीब किसी और बिरादरी का जबकि चादर घाट के इर्द गिर्द बड़ोड़ बिरादरी के अफ़राद क़ाबिज़ हैं और उन तमाम बिरादरीयों को ग़ैर मुक़ामी शरपसंद अनासिर ने मज़हब के नाम पर गुमराह कर रखा है। चुनांचे हुकूमत ने जैसे ही ऐलान किया कि नदी का इलाक़ा ख़ूबसूरत बनाया जाएगा तो चंद ही दिनों में यहां कसीर तादाद में छोटे बड़े मंदिर क़ायम होगए। अदालत-ए-आलिया के बाब उलदाखिला के बिलकुल रूबरू 200 मुरब्बा गज़ज़मीन में एक पुख़्ता मंदिर तामीर होचुका है, जो वाज़ेह तौर पर क़ानून की धज्जियां उड़ा रहा है और इस जैसे बहुत सारे मंदिर वहां तामीर होचुके हैं और ऐसा महसूस होता है कि जब यहां ख़ूबसूरत पार्क वग़ैरा क़ायम होंगे तब तक ये इलाक़ा मूसा नदी के बजाय मंदिरों की नदी कहलाएगा और इस से आगे बढ़ कर हम आप को एक हैरत अंगेज़ इन्किशाफ़ की तरफ़ ले चलते हैं, पुराना पुल जो गोलकुंडा और हैदराबाद दोनों शहरों को जोड़ने के लिए तामीर हुआ था और पहले कभी बहुत ख़ूबसूरत हुआ करता था।

अब इस के ऊपर दोनों तरफ़ से सब्ज़ी और फलों का बाज़ार लगता है, जिस की वजह से राहगीरों को सख़्त मुसीबत का सामना करना पड़ता है। आज हम इस के ज़िक्र को तूल ना दे कर यहीं छोड़ते हैं। हम ज़िक्र छेड़ते हैं पुराने पुल के बड़े दरवाज़े की, जो कभी दोनों तरफ़ से खुला हुआ था। लोग इस से आया जाया करते थे, लेकिन मख़सूस तबक़े के अफ़राद ने अब इस दरवाज़े को एक तरफ़ से बंद करके मंदिर की शक्ल दे दी है और इस में बाक़ायदा पूजापाट शुरू करदी गई है। बात यहीं पर ख़तम नहीं होजाती। इस दरवाज़े के ऊपर एक कुतबा नसब था, जिस में फ़ारसी रस्म उल-ख़ज़ में कुछ मकतूब था।

ग़ालिबन वही शेअर होगा जो ऊपर लिखा गया है। इस कुतबा के हुरूफ़ ऊपर को उभरे हुए थे। इन शरपसंदों ने इस कुतबा के ऊपर इतनी सफेदी पोती कि सफेदी की तहों के अंदर हुरूफ़ दब गए अब वहां बिलकुल महसूस नहीं होता कभी कोई कुतबा रहा होगा। बिलकुल नाम-ओ-निशान मिटाने की कोशिश की गई। रिपोर्ट में दी गई तस्वीर को ग़ौर से देखें, किस तरह हमारे नाम-ओ-निशान मिटाने की नापाक सुई की गई। इन शरपसंद अनासिर को ये जान लेना चाहीए कि जब से दुनिया का वजूद हुआ है तब से दुश्मन हमें मिटाने की कोशिश में लगा हुआ है। इन की कोशिशें बे कार गई और जा रही हैं और जाती रहेंगी।

हम माज़ी में भी ज़िंदा क़ौम की तरह थे,मुस्तक़बिल में भी ज़िंदा क़ौम की तरह मुल़्क की ख़िदमत करते रहेंगे। कहां कहां से हमें हटाने की कोशिश करोगे मुल्क के ज़र्रे ज़र्रे और पता पिता पर हमारा नाम सबुत है। क़ारईन पहले इन शरपसंदों ने इस नदी पर क़बज़ा जमाया फिर आहिस्ता आहिस्ता मंदिरें तामीर कीं, हालाँकि हमारे मुल़्क की मुअज़्ज़िज़ अदालत-ए-उज़्मा ने एक वाज़िह हुक्मनामा जारी करते हुए हिंदूस्तान भर की तमाम मातहत अदालतों, मर्कज़ी-ओ-रियास्ती हुकूमतों,अमन-ओ-अमान की बरक़रारी-ओ-बहाली के ज़िम्मेदार इंतिज़ामीया-ओ-इदारों को ख़बरदारकरदिया था कि अवामी मुक़ामात, सरकारी अराज़ी, सड़कों-ओ-शाहराहों और फुटपाथों वग़ैरापर किसी भी किस्म की और किसी भी मज़हब की इबादतगाह या निशान बरक़रार ना रखी जाय और ना ही जदीद तामीर की इजाज़त दी जाय। इस वाज़िह हुक्मनामा की ख़िलाफ़वरज़ी करते हुए गै़रक़ानूनी मंदिरें बनाए और यहां पर पहुंच कर भी उन की नापाक ज़हनीयत को सब्र ना आया तो पुल की तारीख़ और शक्ल बदलने की शैतानी हरकत की।

चंद ग़ैर मुक़ामी शरपसंदों का तिजारत या किसी भी बहाने हैदराबाद आकर पनाह लेना फिर यहां उसे नित नए हथकंडे अपनाना, शहर की पुरअमन-ओ-पुरसुकून फ़िज़ा-ए-को आलूदाऔर मुकद्दर करना क्या क़ानून की मुहाफ़िज़ पुलिस की नज़र-ओ-फ़हम से मावरा-ए-है। हम ये मानते हैं कि हिंदूस्तान के हर शहरी को हिंदूस्तान के किसी भी मुक़ाम पर जाकर आबाद होने का पूरा हक़ है, लेकिन साथ ही हर शहरी को ये भी मालूम होना चाहीए कि किसी को भी इस मुल़्क की सरज़मीन के किसी भी ख़ित्ता पर बदअमनी और शर अंगेज़ी फैलाने काज़र्रा बराबर हक़ हासिल नहीं। किसी भी मुल्क में अमन-ओ-अमान बरक़रार रखने केलिए वहां की पुलिस और दीगर सरकारी मिशनरी इन अनासिर का पता चलाती हैं जो खु़फ़ीयातौर पर अमन-ओ-अमान को सुबू ताज करने के दर्पा रहते हैं।

तो फिर क्या बात है कि खुल्लम खुल्ला ये साज़िशें मंज़र-ए-आम पर आरही हैं और पुलिस ख़ामोशी इख़तियार किए हुए और उन शरपसंदों के आगे बिलकुल बेबस-ओ-मजबूर दिखाई दे रही है। हमारा मुतालिबा हैकि मुल्क के क़ानून और अमन-ओ-अमान को उसे शरपसंदों के ज़रीया पामाल होने से बचाया जाय और इस मास्टरमाइंड का सुराग़ निकाला जाय जो इस मंसूबा बंद और मुनज़्ज़म साज़िश के पीछे काम कररहा है ताकि हमारे शहर और मुल्क का अमन-ओ-अमान बहाल रहे और उसे ज़हरीले अनासिर से हमारे मुल्क को नजात हासिल हो।

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