Wednesday , December 13 2017

पुराने शहेर में मासूम बच्चों के मुस्तक़बिल(भविष्य‌) के साथ खिलवाड़

स्कूलों की तबाह हाली पर हुकुमत ख़ामोश , गुलशन नगर प्राइमरी स्कूल बुनियादी सहूलतों से महरूम , ओलयाए तलबा ब्रहम , हुकूमत पर सिर्फ वाअदा करने का इल्ज़ाम किसी क़ौम को तरक़्क़ी , ख़ुशहाली कामयाबी और‌ कामरानी से रोकना हो तो कहा जाता है कि इस की नौजवान और नई नसल को हुसूल तालीम से रोक दिया जाय अगर तालीम ना होगी तो वो क़ौम ख़ुदबख़ुद पसमांदगी ग़ुर्बत-ओ-इफ़लास और जहालत से जुड़ी तमाम बीमारियों का शिकार होजाएगी । हर क़ौम तरक़्क़ी करना चाहती है । ख़ुशहाल‍ और‌ बावक़ार ज़िंदगी गुज़ारना इस का ख़ाब होता है ।

क़ौम का बच्चा बच्चा ज़ेवर तालीम से आरास्ता हो ये उस की ख़ाहिश होती है । नौजवान सरकारी और‌ गैर सरकारी इदारों में आला ओहदों पर फ़ाइज़ हो ये उस की तमन्ना होती है हॉस्पिटल में उन के डॉक्टर्स नज़र आएं और हज़ारों ईनजीनिय‌रस साईंसदानों और पेशा वाराना माहिरीन की सफ़ में इस के नौजवान भी खड़े दिखाई दे । ये क़ौम की दाएं होती हैं एसा ही कुछ मुस्लमान बिलख़सूस पुराने शहर में बसने वाले गरीब मुस्लमान भी चाहते हैं ।

जस्टिस सच्चर और रंगनाथ मिश्रा की तरफ‌ से पेश करदा रिपोर्टस और सिफ़ारिशात में मुस्लमानों को तालीमी और‌ मआशी तौर पर इंतिहाई पसमांदा क़रार दीए जाने के बावजूद मुल़्क की इस सब से बड़ी अक़लियत की तालीमी तरक़्क़ी पर कोई तवज्जु नहीं दी जा रही है । पुराने शहर में उसे कई स्कूलस हैं । जो बुनियादी सहूलतों से महरूम हैं तंग और‌ तारीक इमारतों में मुतअद्दिद स्कूलस काम कररहे हैं ।

एक इमारत में चार चार स्कूल काम करते हुए किसी को देखना हो तो वो पुराने शहेर का दौरा करे । उसे इस तरह के कई स्कूलस नज़र आएंगे । स्कूल का ज़िक्र करते ही हर किसी के ज़हन में पर फ़िज़ा-ए-माहौल कुशादा क्लास रूम्स , वसीअ-ओ-अरीज़ मैदान पर मुश्तमिल एक ग़ैरमामूली इमारत का तसव्वुर आजाता है । लेकिन शहेर में एसे भी स्कूलस हैं जो सिर्फ एक कमरे में काम कररहे हैं हद तो ये है कि इस एक कमरा में दो स्कूलस चलाए जा रहे हैं इस में ना सिर्फ क्लासस ली जाती हैं बल्कि उसी कमरे में स्टाफ़ रुम ऑफ़िस प्रिंसिपल का इजलास(मीटींग‌) सब कुछ काम कररहा है ।

मलक पेट में वाक़्य इस स्कूल की हालत से हैदराबाद में तालीम के तुएं हुकूमत की अदम दिलचस्पी ग़फ़लत और‌ लापरवाही का इज़हार होता है । एसा ही एक स्कूल गर्वनमैंट प्राइमरी स्कूल उर्दू मीडियम गुलशन नगर निज़द मिस्री गंज में जहां एक छोटे से घर में ये स्कूल चलाया जा रहा है । 8×8 के चार तंग और तारीक कमरों में 90 बच्चे तालीम हासिल कररहे हैं । दो टीचर्स हैं जब कि दो विद्या वालेनटरस भी नई नसल को तालीम दे रहे हैं ।

गुलशन नगर पुराने शहर का इंतिहाई पसमांदा इलाक़ा ( सल्लम बस्ती ) है और यहां सद फीसद मुस्लिम आबादी है । इस बस्ती में गरीब लोग रहते हैं जो चाहते हैं कि इन के बच्चे पढ़ लिख कर एक कामयाब इंसान बनें । ख़ुशहाल ज़िंदगी गुज़ारें । इस स्कूल में आप को कहीं भी फर्नीचर दिखाई नहीं देगा । मासूम बच्चे ज़मीन पर बैठ कर तालीम हासिल कररहे हैं । एसा लगता है कि पुराना शहेर में स्कूलों को बुनियादी सहूलतों से महरूम रखते हुए हुकूमत और रियासती वज़ारत तालीम बच्चों और उन के मुस्तक़बिल के साथ खिलवाड़ कररही है ।

मुक़ामी अफ़राद(लोग) के मुताबिक़(अनुसार‌) यहां के चारों टीचर्स बड़ी दिलचस्पी से बच्चों को पढ़ा रहे हैं लेकिन स्कूल बुनियादी सहूलतों से महरूम है । बच्चों को ज़मीन पर बैठे रहना पड़ता है ओलयाए तलबा स्कूल की हालत और हुकूमत की ग़फ़लत और‌ लापरवाही से काफ़ी नाराज़ और‌ ब्रहम हैं । उन लोगों का कहना है कि हुकूमत स्कूली तालीम को फ़रोग़ देने हज़ारों करोड़ रुपय मुख़तस करने के ऐलानात करती है लेकिन मासूम बच्चे जो मुल्क और‌ क़ौम का मुस्तक़बिल(भविष‌) होते हैं मियारी बुनियादी तालीम से महरूम रहते हैं ।

एक तालिब-ए-इल्म के सरपरस्त ने बताया कि वज़ीर आज़म डाँक्टर मनमोहन सिंह ने हाल ही में कहा है कि हिंदूस्तान में नाक़िस ग़िज़ा के वजह से लाखों बच्चे वज़न की कमी का शिकार हैं उसे मे हैदराबाद के गरीब मुस्लमान कह सकते हैं कि इन के बच्चे नाक़िस तालीम का शिकार है हद तो ये है कि तालीम से ही महरूम हैं । स्कूल की हेड मिस्ट्रेस ने बताया कि इस इमारत का किराया माहाना 7 हज़ार रुपय अदा किया जाता है । जब कि विद्या वालेनटरस की हैसियत से पढ़ाने वाली टीचरों ने बताया कि वो चार माहिने से तनख़्वाह हासिल ना करसके ।

उन लोगों ने सवाल किया कि आख़िर उन्हें ही , तनख़्वाह ताख़ीर से क्यों दी जाती है ? गुलशन नगर के गरीब मकीन सच्च कहते हैं हुकूमत के दावे खोखले होते हैं क्यों कि हाल ही में तालीमी पनदरहवाड़ा का आग़ाज़ करते हुए चीफ मिनिस्टर मिस्टर एन किरण कुमार रेड्डी ने कहा था कि हुकूमत ने स्कूली तालीम के फ़रोग़ और स्कूलों में बुनियादी सहूलतों की फ़राहमी के लिये बिलतर्तीब तीन हज़ार और 2400 करोड़ रुपय ( 500 स्कूलों में इनफ़रास्ट्रक्चर के लिये ) ख़र्च करने का फैसला किया है ।

लेकिन ये रक़म कहां जा रही इस के बारे में चीफ मिनिस्टर और महिकमा तालीमात के ओहदेदार हमें बेहतर तौर पर बता सकते हैं । हुकूमत के ऐलान करदा फंड्स एसा लगता है कि पुराने शहेर में वाक़्य स्कूलस की हालत सुधारने के लिये नहीं बल्कि दीगर इलाक़ों के लिये है । अवाम ये जानने की ख़ाहां है कि आख़िर पुराने शहेर में ही स्कूलस तबाहकुन हालात में क्यों है । बुनियादी सहोलतो हती कि बैत उल-खला की सहूलत से भी उन्हें क्यों महरूम रखा गया है ।

एक ही इमारत में दो दो चार चार स्कूलस क्यों चलाए जा रहे हैं ? तालीमी और‌ मआशी तौर पर इंतिहाई पसमांदा मुस्लमानों के मासूम बच्चों के मुस्तक़बिल(भविष्य‌) के साथ खिलवाड़ क्यों किया जा रहा है । चीफ मिनिस्टर ने स्कूलों में तक़रीबन‌ 13 हज़ार कमरे 50 हज़ार बैत उल ख़ला , 10 हज़ार नए क्लास रूम्स , तामीर करने का भी ऐलान किया था लेकिन होसकता है कि उन्हें उस वक़्त पुराने शहेर का ख़्याल ही ना आया हो ।

बेहेरहाल स्कूलों की ख़सताहाली अगर देखनी हो तो आप मिस्री गंज के करीब गुलशन नगर जाईए । तब आप को अंदाज़ा होगा कि मासूम मुस्लिम बच्चों को किस किस्म की तालीमी सहूलत फ़राहम की गई है । इस स्कूल को देख कर आप की ज़बान से ये अलफ़ाज़ ज़रूर अदा होंगे कि कहीं मुस्लमानों को तालीम से महरूम रखने के लिये इस तरह की ग़फ़लत तो नहीं बरती जा रही है वैसे भी हमारे पास हुकूमत से इस तरह का सवाल करने की किसी में जुर‌रत भी नहीं है ।।

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