Saturday , April 21 2018

‘पूछते हैं वो कि ग़ालिब कौन है’……

आज मिर्ज़ा ग़ालिब की यौम-ए-वफात है, आज ही के दिन गालिब ने इस दुनिया को शायरी के बेशकीमती तोहफों से नवाज अलविदा कह दिया था। मिर्ज़ा असद-उल्लाह बेग ख़ां उर्फ ‘ग़ालिब’ का जन्म 27 दिसंबर 1796 को आगरा में हुआ था। मिर्जा गालिब उर्दू और फारसी के अज़ीम शायर थे। ग़ालिब के लिखे पत्र जो उस समय प्रकाशित नहीं हुए थे, उन्हें उर्दू लेखन का महत्वपूर्ण दस्तावेज़ माना जाता है। उन्हें दबीर-उल-मुल्क और नज़्म-उद-दौला का खिताब भी मिला है।
13 वर्ष की आयु में उनका निकाह नवाब ईलाही बख्श की बेटी उमराव बेगम से हो गया था। विवाह के बाद वह दिल्ली आ गये थे, जहां उनकी तमाम उम्र बीती। अपने पेंशन के सिलसिले में उन्हें कोलकाता कि लम्बी यात्रा भी करनी पड़ी थी, जिसका ज़िक्र उनकी ग़ज़लों में जगह–जगह पर मिलता है। आइए एक नज़र डालते हैं गालिब के कुछ मशहूर कलाम पर…
शेरों-शायरी की दुनिया में मिर्जा गालिब एक पैमाना है जिसके आगे लगभग सारे शायर नतमस्तक हैं। गालिब ने शायरी की दुनिया को मोहब्बत और गम से ऐसा लबरेज किया है कि उलफत का गुलशन आज भी गालिब की शायरियों से महक रहा है। गालिब की परिपाटी में चलकर ही कई शायरों ने अपने को मुकम्मल किया है। आज भी गालिब के चाहने वालों की कमी नहीं है। इतने सालों बाद उतनी ही शिद्दत से गालिब को हर जगह तारीफ मिल रही है। गालिब की आज पुण्यतिथि है। इस अवसर पर हम यहां काव्य चर्चा के तहत  उनके स्पेशल शेर पेश कर रहे हैं।

अगर और जीते रहते यही इंतिज़ार होता…

ये न थी हमारी क़िस्मत कि विसाल-ए-यार होता
अगर और जीते रहते यही इंतिज़ार होता

दर्द मिन्नत-कश-ए-दवा न हुआ
मैं न अच्छा हुआ बुरा न हुआ

दर्द का हद से गुज़रना है दवा हो जाना…

इशरत-ए-क़तरा है दरिया में फ़ना हो जाना
दर्द का हद से गुज़रना है दवा हो जाना

रगों में दौड़ते फिरने के हम नहीं क़ाइल
जब आँख ही से न टपका तो फिर लहू क्या है

उसी को देख कर जीते हैं जिस काफ़िर पे दम निकले…

मोहब्बत में नहीं है फ़र्क़ जीने और मरने का
उसी को देख कर जीते हैं जिस काफ़िर पे दम निकले

न था कुछ तो ख़ुदा था कुछ न होता तो ख़ुदा होता
डुबोया मुझ को होने ने न होता मैं तो क्या होता

कौन जीता है तिरी ज़ुल्फ़ के सर होते तक…

आह को चाहिए इक उम्र असर होते तक
कौन जीता है तिरी ज़ुल्फ़ के सर होते तक

बस-कि दुश्वार है हर काम का आसाँ होना
आदमी को भी मयस्सर नहीं इंसाँ होना

हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी कि हर ख़्वाहिश पे दम निकले…

हैं और भी दुनिया में सुख़न-वर बहुत अच्छे
कहते हैं कि ‘ग़ालिब’ का है अंदाज़-ए-बयाँ और

हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी कि हर ख़्वाहिश पे दम निकले
बहुत निकले मिरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले

-मिर्जा गालिब

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