प्रधानमंत्री के प्रयासों के बावजूद वाराणसी के बुनकरों की हालत में सुधार नहीं

प्रधानमंत्री के प्रयासों के बावजूद वाराणसी के बुनकरों की हालत में सुधार नहीं

वाराणसी: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रयासों के बावजूद पारंपरिक बनारसी साड़ियों के लिए मशहूर वाराणसी के बुनकरों की वित्तीय स्थिति में कोई खास सुधार नहीं हुआ है क्योंकि भ्रष्टाचार और प्रशासनिक बाधाओं के कारण केंद्र की वित्तीय सहायता उन जरूरतमंद तक नहीं पहुंच पा रही है.

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प्रदेश 18 के अनुसार, वाराणसी में चल रहे अंतरराष्ट्रीय व्यापार मेले में केंद्रीय अल्पसंख्यक मंत्रालय के कौशल हाट में स्टाल लगाने वाली बनारसी साड़ियां तैयार करने वाली शबाना खान ने यू एन आई से कहा, ” केंद्र सरकार हमें रियायती ब्याज पर ऋण मुहैया कराती है लेकिन इसके लिए लम्बी चौड़ी कागजी कार्रवाई पूरी करनी पड़ती है. सबसे ज्यादा कठिनाई जमानती खोजने में होती है. अगर गारंटी लेने वाला मिल भी जाए तो बैंक वाले हर तरह से बाधाएं पैदा करते हैं, अंत में थक हारकर अधिक ब्याज पर निजी बैंकों से ही कर्ज लेना पड़ता है.

एक दुसरे बुनकर हसनैन का कहना है कि राज्य में भ्रष्टाचार का आलम यह है कि सरकारी सहायता देने से संबंधित अधिकारी 50 प्रतिशत तक कमीशन मांगते हैं. हसनैन ने कहा कि कुछ खास लोगों ने कई सोसाइटयाँ बना रखी हैं और सभी के नाम पर सरकारी मदद ले लेते हैं और जरूरतमंद कार्यालयों के चक्कर काटता रह जाता है. सुंदर बनारसी साड़ियों के कुशल कारीगर खुर्शीद अहमद ने बुनकरों की खस्ता हाली बयान करते हुए कहा कि कुशल होने के बावजूद बुनकर गरीबी और कुपोषण के शिकार हैं. उन्हें अपनी मेहनत की वाजिब कीमत नहीं मिलती. एक अच्छी साड़ी तैयार करने में 20 से 25 दिन लग जाते हैं और बुनकरों को महज तीन से चार हजार रुपये मिलते हैं. बढ़ती महंगाई के कारण उनके लिए परिवार का पेट पालना मुश्किल हो रहा है. मजबूरन वह पारंपरिक कारीगरी छोड़कर दूसरे धंधे कर रहे हीं. अहमद की शिकायत थी कि सरकार बुनकरों पर ध्यान नहीं दे रही है.
एक अन्य व्यापारी साजिद हुसैन ने यू एन आई को बताया कि एक तरफ तो आधुनिक रूह्जान और सलवार –कुर्तों के फैशन में आने से देश में बनारसी साड़ियों की मांग कम हो गई है, तो दूसरी ओर रेशम महंगा होने से उनकी लागत अधिक आ रही है जिससे अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिता में टिक पाना मुश्किल हो रहा है. हुसैन ने कहा कि इस व्यवसाय में लाभ कम होने की वजह से नई पीढ़ी भारतीय कला के इस समृद्ध विरासत से दूर हो रही है. हुसैन का कहना था कि या तो गारंटी समाप्त किया जाना चाहिए या मंत्रालय को खुद गारंटी लेनी चाहए. उनहोंने ने कहा कि बिजली की आपूर्ति ठीक न होने की वजह से भी यह उद्योग संकट की शिकार हो रही है. इसलिए बिजली में सब्सिडी मिलनी चाहिए. उन्होंने कहा कि बारीक काम की वजह से बुनकरों की आंखें कमजोर हो जाती हैं. उनके लिए मुफ्त इलाज की व्यवस्था होनी चाहिए. मंत्रालय द्वारा पहली बार इस मेले में मुक्त स्टाल और आने जाने का खर्च दिए जाने को सबने अच्छी पहल बताई.

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