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प्रधानमंत्री मोदी से चिट्ठी लिख बेहतर सैलरी की मांग करने पर चार तटरक्षक बलों को जेल

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी समेत केंद्र सरकार के बड़े-बड़े मंत्री आए दिन भारतीय सेना की बहादुरी का मुद्दा उठाते हैं। मगर विभागीय भेदभाव और गरिमा का सवाल उठाने पर सरकार ने भारतीय तटरक्षक बल के कुछ गार्डों की सैलरी काट ली। इसके अलावा चार गार्डों को जेल में डाल दिया और कम से कम 46 अन्य गार्ड भी वेतन कटौती की चपेट में हैं। इन गार्डों को अपराध इतना है कि इन्होंने प्रधानमंत्री को चिट्ठी लिखकर बेहतर सैलरी और सेवाओं में सम्मान, गरिमा की मांग की थी। पिछले साल दिसम्बर में एक नाविक मनीष जी. ने पीएम को चिट्ठी लिखकर बताया कि उन्होंने भारतीय तटरक्षक बल में पांच साल तक अपनी सेवाएं दी हैं।

मगर उनके जैसे 10 हज़ार नाविक विभागीय भेदभाव का शिकार हैं। मगर इस साल के शुरू में जवाब देने की बजाय मनीष (24) को नज़रबंद कर दिया गया, जहां वे एक महीना गुज़ारने के बाद वह कुछ कमजोर हो गए थे। 8 दिसंबर 2015 को लिखी गई चिट्ठी कैच के पास मौजूद है।

अपराध

मनीष की कहानी भारतीय तटरक्षक बल के 38 साल के इतिहास की असामान्यता की कहानी है जहां असहमति के बोल शायद ही कभी सुने जाते हैं। मनीष का दावा है कि भारतीय तटरक्षक बल के गार्डों और इंडियन नेवी के स्टाफ के बीच कई मोर्चों पर काफी पक्षपात है। मनीष ने अपनी चिट्ठी में यह जानना चाहा था कि रक्षा मंत्रालय के अधीन आने के बावजूद कोस्ट गार्ड, सैन्य सेवा वेतनमान के अधिकारी क्यों नहीं हैं? उन्होंने नाविकों के काम के घंटों के बारे में भी सवाल किया था।

क्या कहती है चिट्ठी

  1. भारतीय तटरक्षक बल के नाविक महीने में 22 से लेकर 28 दिन तक काम करते हैं। रोटेशन के आधार पर उन्हें 24 घंटे सातों दिन ड्यूटी पर रहना होता है, बिल्कुल सैन्य सेवाओं की तरह। समुद्र में रहने के दौरान उन्हें उल्टियां होती हैं, बेहोशी आ जाती है, बुखार आ जाता है, तब भी वे बिना किसी शिकायत के काम करते रहते हैं।
  1. व्यावहारिक रूप से तो इंडियन नेवी और भारतीय तटरक्षक बल की सेवाओं में कोई फर्क़ नहीं है। फिर भी पांच साल की सेवाओं के बाद भारतीय तटरक्षक को क्यों हर महीने में सिर्फ़ 14,500 रुपए मिलते हैं जबकि नेवी के नाविक की तनख़्वाह 31 हज़ार रुपए प्रतिमाह से भी ज़्यादा है।
  1. भारतीय तटरक्षक के नाविक सैन्य सेवा वेतनमान की तरह मिलिट्री नर्सिंग सर्विस, डिफेन्स सिक्यूरिटी फोर्स के तहत आने वाले वेतनमान के अधिकारी क्यों नहीं हैं।
  2. हम सभी तरह के सैन्य अभ्यासों, खोज और बचाव अभियानों में शामिल होते हैं. नेवी की तरह ही समुद्र, द्वीप समूहों की निगरानी करते हैं लेकिन सैलरी के मामले में तटरक्षकों के साथ मामला बिल्कुल जुदा है।

नाविकों की मांग

  1. तटरक्षकों को सेन्ट्रल सिविल सर्विस नियमों के तहत रक्षा सेवाओं के सिविलियनों की तरह वेतन दिया जाना चाहिए। क्योंकि हमारे बीच सबकुछ समान है ट्रेनिंग, सिस्टम, कानून और संगठन से लेकर सज़ा तक, सिवाय वेतन को छोड़कर।
  2. अगर हम सेन्ट्रल सिविल सर्विस नियमों के तहत आते हैं तो हमसे भी एक दिन में सिर्फ़ 8 घंटे ही काम लिया जाना चाहिए।
  3. तटरक्षक के 10 हज़ार नाविक ऊपरवाले से प्रार्थना करते हैं कि उनकी ज़िंदगी में भी नया सूर्योदय हो। क्या यह दिन आएगा?

मगर इस चिट्ठी के कुछ दिन बाद ही मनीष ने खुद को इंडियन नेवी के तहत आने वाले मिलिट्री डिटेन्शन क्वॉर्टर के एक सेल में पाया। डिटेंशन सेल ने निकलने के बाद मनीष ने 02 जून 2016 को एक और चिट्ठी प्रधानमंत्री की लिखी। जब वह दूसरी चिट्ठी लिख रहे थे, तब वह कम सुन पाने की बीमारी का शिकार हो गए थे। पहली चिट्ठी लिखने से पहले ड्यूटी पर रहने के दौरान उनका एक्सिडेंट हो गया था। तब उन्हें इलाज की सलाह दी गई थी लेकिन चिट्ठी लिखने की वजह से उन्हें डिटेंशन सेंटर में डाल दिया गया। मनीष का इलाज नहीं हो सका। जिस जेल में उन्हें रखा गया था, उसकी दीवार फायरिंग रेंज से सटी हुई थी। जब उनकी हालत ज्यादा खराब हो गई तो उन्हें विशाखापट्नम के अस्पताल में भर्ती करवाया गया मगर तब तक बाएं कान से सुनने की क्षमता घट गई थी।

मनीष की चिट्ठी को देखते हुए भारतीय तटरक्षक सेवाओं के 49 अन्य नाविकों ने भी राष्ट्रपति से पत्र लिखकर गुहार लगाई है। इसकी कॉपी गृह मंत्रालय, भारतीय तटरक्षक मुख्यालय, लोकसभा अध्यक्ष और सुप्रीम कोर्ट को भी भेजी गई है।  मगर इस बार भी मनीष की तरह तीन अन्य नाविकों को जेल में डाल दिया गया जबकि 46 नाविकों की सैलरी काट ली गई। कुल कितने नाविक सज़ा का शिकार हुए हैं, इसका सही आंकड़ा कैच नहीं जुटा सका क्योंकि ज्यादातर नाविक मीडिया से बात करने को तैयार नहीं हैं।

मनीष और भारतीय तटरक्षक के अन्य नाविकों ने अपने साथ अमानवीय सेवा का मुद्दा ऐसे समय में उठाया है जब देशभर में शहीदों के नाम पर दिए जलाए जा रहे हैं और सर्जिकल स्ट्राइक के बहाने सरकार देशभर में सेना की बहादुरी और उनकी जय-जय करने में लगी हुई है।

क्या नाविक हीन भावना का शिकार हैं?

कैच ने इस सिलसिले में कुछ वरिष्ठ रक्षा अधिकारियों से बात की। कोस्ट गार्ड के एक पूर्व महानिदेशक कहते हैं कि तटरक्षकों को अपनी ज़िम्मेदारी के महत्व को महसूस करना चाहिए बजाए इंडियन नेवी के समकक्ष सुविधाओं के लिए संघर्ष करने के। भारतीय तटरक्षक में इन्फीरियटी कॉम्पलेक्स की भावना आने को काफी चिन्ताजनक बताते हुए कैप्टन बंसल कहते हैं कि सैन्य भावना का होना बहुत ज़रूरी है। हर भूमिका और ज़िम्मेदारी की अपनी पवित्रता है।

इस रिपोर्टर ने नाविकों के तमाम सवालों पर जवाब जानने के लिए भारतीय तटरक्षक को ई-मेल किया लेकिन कोई जवाब नहीं मिला। इसी तरह इंडियन नेवी ने भी इस मुद्दे पर कुछ भी कहने से साफ़ इनकार कर दिया है।

लेख: निशांत सक्सेना

साभार: कैच न्यूज हिंदी

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