Wednesday , December 13 2017

पड़ोसी के साथ हमदर्दी

हज़रत अब्बू शरी रज़ी० से मर्वी है कि हुज़ूर नबी करीम स०अ०व० ने फ़रमाया ख़ुदा की क़सम! वो मोमिन नहीं, ख़ुदा की क़सम! वो मोमिन नहीं, ख़ुदा की क़सम! वो मोमिन नहीं। अर्ज़ किया गया या रसूलुल्लाह ! वो कौन लोग हैं?।

हज़रत अब्बू शरी रज़ी० से मर्वी है कि हुज़ूर नबी करीम स०अ०व० ने फ़रमाया ख़ुदा की क़सम! वो मोमिन नहीं, ख़ुदा की क़सम! वो मोमिन नहीं, ख़ुदा की क़सम! वो मोमिन नहीं। अर्ज़ किया गया या रसूलुल्लाह ! वो कौन लोग हैं?।

आप स०अ०व० ने फ़रमाया जिसके शर-ओ-फ़साद से इसका पड़ोसी मामून ना हो (बुख़ारी शरीफ़) अगर कोई शख़्स अपने पड़ोसी के साथ अच्छा बरताव करता है, उनके साथ मुहब्बत से पेश आता है और वो अपने पड़ोसी की नज़र में अच्छा है तो ऐसा शख़्स ख़ुदा के नज़दीक भी बेहतर है।

आप ( स०अ०व०) ने इरशाद फ़रमाया अल्लाह तआला के नज़दीक अच्छा पड़ोसी वो है, जो अपने पड़ोसी के लिए अच्छा हो। (तिरमिज़ी)

किसी शख़्स के अच्छे या बुरे का मदार इसके पड़ोसी पर है। अगर इसका पड़ोसी इसके बारे में अच्छा होने का फ़ैसला करे तो वो अच्छा है, वरना बुरा है।

चुनांचे एक साहिब ने हुज़ूर नबी करीम स०अ०व० से दरयाफ्त किया कि या रसूलुल्लाह! में अपने बुरा या अच्छा होने के बारे में कैसे जानें ?। आप ( स०अ०व०) ऐ ने फ़रमाया जब तुम अपने बारे में अपने पड़ोसी को अच्छा कहते हुए सुनो तो तुम अच्छे हो और जब बुरा कहते हुए सुनो तो तुम बुरे हो (मिशकातुल मसाबीह)

हुज़ूर स०अ०व० ने फ़रमाया तुम जानते हो पड़ोसी का क्या हक़ है?। जब वो तुम से मदद का तलबगार हो तो उसकी इआनत करो। अगर वो क़र्ज़ मांगे तो उसे क़र्ज़ दो। अगर वो मोहताज हो जाये तो इसके साथ भलाई-ओ-एहसान करो। अगर वो बीमार हो जाए तो उसकी इयादत करो।

इसका इंतेक़ाल हो जाये तो इसके जनाज़ा में शरीक रहो। अगर उसे ख़ुशी हासिल हो तो उसे मुबारकबादी दो। अगर वो मुसीबत में गिरफ़्तार हो तो उसे तसल्ली दो। (अहया अल-उलूम)

पड़ोसी के मुताल्लिक़ हज़रत इमाम ग़ज़ाली रह० की दर्ज ए जे़ल हिदायात को हमेशा सामने रखना चाहीए। आप फ़रमाते हैं कि सलाम में पहल करे, इसके साथ ज़्यादा लंबी गुफ़्तगु ना करे, इसके हालात के बारे में ज़्यादा पूछगिछ ना करे, उसकी इयादत करे, मुसीबत में उसकी ताज़ियत करे, मुसीबत पर सब्र करने में इसका साथ दे, ख़ुशी के मौक़ा पर उसे मुबारकबादी दे और इसके साथ ख़ुशी में शरीक होने का इज़हार करे, उसकी ख़ताओं को दरगुज़र करे, बुराई नज़र आए तो पर्दापोशी करे, जब कोई मुसीबत पेश आए तो उसे हलाकत से बचाए, उसकी ग़ैरमौजूदगी में इसके घर की हिफ़ाज़त-ओ-निगहबानी से ग़फ़लत ना बरते, इसके ख़िलाफ़ बात पर कान ना धरे, उसकी बीवी की तरफ़ से अपनी निगाह नीची रखे, इसके ख़ादिम पर हमेशा नज़र ना रखे, इसके बच्चों के साथ नरम लहजा में गुफ़्तगु करे, दीन-ओ-दुनिया के मुआमले में इससे जो ग़फ़लत और लापरवाही हो इस जानिब रहनुमाई करे। (अहया अल-उलूम, जलद२, सफ़ा १९४)

हज़रत अबूहुरैरा रज़ी० फ़रमाते हैं कि एक शख़्स ने हुज़ूर नबी अकरम स०अ०व० से दरयाफ्त किया कि या रसूलुल्लाह फ़लां औरत बहुत ज़्यादा नमाज़ पढ़ती है, रोज़े रखती है और सदक़ा करती है, लेकिन वो अपनी पड़ोसन को अपनी ज़बान से तकलीफ़ देती है।

हुज़ूर अकरम स०अ०व० ने फ़रमाया ये औरत जहन्नुम में जाएगी।

इसके बाद हज़रत अबूहुरैरा रज़ी० ने अर्ज़ किया या रसूलुल्लाह ! फ़लां औरत नमाज़ कम पढ़ती है, रोज़ा कम रखती है और मामूली सदक़ा करती है, लेकिन वो अपने पड़ोसी को अपनी ज़बान से तकलीफ़ नहीं देती। हुज़ूर अकरम स‍०अ०व० ने फ़रमाया ये औरत जन्नत में जाएगी।

पड़ोसी के साथ ताल्लुक़ात मुस्तहकम और पायदार रखने का एक क़ीमती नुस्ख़ा ये है कि उनके साथ हदाए और तहाइफ़ का सिलसिला जारी रखा जाये, इससे मुहब्बत में मज़ीद इज़ाफ़ा होगा, दोनों के दरमीयान मुहब्बत-ओ-ताल्लुक़ में ये चीज़ें संग‍ ए‍ मेल का काम देंगी।

चुनांचे हुज़ूर अकरम स०अ०व० ने हज़रत अबूज़र रज़ी० को नसीहत करते हुए फ़रमाया ऐ अबूज़र! जब तुम शोरबादार चीज़ पकाओ तो इसमें पानी ज़्यादा डाल दिया करो और अपने पड़ोसी की ख़िदमत में पेश किया करो।

पड़ोसी का इतलाक़ क़ुरब-ओ-ज्वार में मौजूद सारे लोगों पर होता है, यहां तक कि हुज़ूर स०अ०व० ने चालीस घर तक पड़ोसी क़रार दिए हैं। हज़रत इमाम ज़ोहरी रह० फ़रमाते हैं कि चालीस घर से मुराद चहार जानिब वाला घर है, यानी दाएं, बाएं, आगे और पीछे, ये सब पड़ोसी हैं, लेकिन हदिया और तोहफ़ा का ज़्यादा मुस्तहक़ वो पड़ोसी होता है, जिसका दरवाज़ा इसके दरवाज़ा से ज़्यादा क़रीब हो।

अगर मुसलमान मज़कूरा बाला हिदायात पर अमल पैरा हो जाये तो वो दुनिया में भी सुख चैन और इत्मीनान-ओ-सुकून की ज़िंदगी गुज़ार सकते हैं और आख़िरत में भी कामयाबी-ओ-कामरानी से हमकिनार होंगे।

अल्लाह तआला हम सब को अपने पड़ोसीयों के साथ हुस्न-ए-सुलूक की तौफ़ीक़ अता फ़रमाए। (आमीन)

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