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फलस्तीन को लेकर भारत पुराने स्टैंड पर कायम, इजरायल ने दबे जबान में किया अफसोस!

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने ऐतिहासिक फलीस्तीन यात्रा के दौरान शांतिपूर्ण माहौल में शीघ्र एक संप्रभु, स्वतंत्र फलीस्तीनी देश बनने की आशा जताई है. उन्होंने फलीस्तीनी हितों की अनवरत और अविचल तौर पर भारतीय समर्थन की प्रतिबद्धता पर भी जोर दिया.

यानि कि भारत अपने पुराने स्टैंड पर अब भी कायम है. इसे कई विश्लेषकों ने इस्राएल के साथ मजबूत होते संबंधों के मद्देनजर भारत की ओर से संतुलन बनाये रखने की कोशिश बताया है.

सवाल ये उठता है कि अगर मोदी संतुलन बनाने का प्रयास कर रहे है तो उसमे किस हद तक सफल रहे. अगर ऐसा नहीं है और वो भारत के इस्राएल और फलीस्तीन के साथ संबंधों को डी-हैफिनेट, यानी कि एक दूसरे से स्वतंत्र भाव से स्थापित करने का प्रयास कर रहे हैं, तो ये प्रयास किस हद तक कारगर हैं.

भारत और इस्राएल के बीच पिछले आठ महीनों के दौरान काफी गर्मजोशी दिखी है. मोदी ने जुलाई में इस्राएल का दौरा किया और उस दौरान उनके इस्राएली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के साथ व्यक्तिगत केमिस्ट्री की बेहद चर्चा रही.

ये किसी भी भारतीय प्रधानमंत्री की इस्राएल की प्रथम यात्रा थी और जिस गर्मजोशी के साथ दोनों नेता नजर आए उससे अटकलें लगाई जाने लगीं कि भारत अब फलीस्तीन का साथ छोड़ कर इस्राएल की और बढ़ रहा है. मगर उसके कुछ महीनों बाद ही ये भ्रम टूट गया जब संयुक्त राष्ट्र संघ में भारत ने फलीस्तीनियों के पक्ष में वोट किया.

नेतन्याहू ने इस पर दबी जुबां में अफसोस जाहिर किया. जनवरी में इस्राएली प्रधानमंत्री भारत पहुंचे और जिस उत्साह के साथ वहां उनका स्वागत हुआ उससे फिर भारत के इस्राएल के प्रति बढ़ते झुकाव की चर्चा शुरू हो गयी. उसके कुछ सप्ताह बाद ही मोदी के फलीस्तीन आने के फैसले ने फिर सबको अचंभित कर दिया.

भारत इस्राएली हथियारों का सबसे बड़ा खरीदार है और दोनों देशो के बीच स्ट्रेटेजिक संबंध हैं. मगर अरब दुनिया में भारत के लिए बहुत कुछ दांव पर है और भारतीय अल्पसंख्यक समुदाय में फलीस्तीन के प्रति सहानुभूति. ऐसे में एक दक्षिणपंथी माने जाने वाले नेता के लिए संतुलन बनाकर चलना या डी-हैफिनेट करना एक कड़ी चुनौती है.

फलीस्तीन में विशेषज्ञों की राय सुनकर एक नया पहलू सामने आया. ज्यादातर फलीस्तीनी अधिकारियों और विश्लेषकों ने कहा कि इस्राएल के साथ भारत के बेहतर संबंधों से असल में उनके देश को फायदा पहुंच सकता है और फलीस्तीनी नेतृत्व प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की यात्रा को इस्राएल के साथ शांति प्रक्रिया फिर से शुरू करने के एक अवसर के तौर पर देखता है.

मोदी का इस क्षेत्र में बढ़े तनाव के बीच रामल्ला आना हुआ. वह फलीस्तीन की यात्रा करने वाले पहले भारतीय प्रधानमंत्री हैं. अमेरिका के राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप के यरुशलम को इस्राएल की राजधानी के तौर पर मान्यता देने के बाद क्षेत्र में तनाव बढ़ गया है.

फलीस्तीन लिबरेशन ऑर्गेनाइजेशन एग्जिक्यूटिव कमेटी के सदस्य अहमद मजदलानी ने कहा कि इस्राएल और भारत के बीच बेहतर संबंधों से फलीस्तीन को मदद मिल सकती है.

द यरुशलम पोस्ट ने मजदलानी के हवाले से कहा, “उनके बीच बढ़ते संबंध सकारात्मक हो सकते हैं क्योंकि अब भारत का इस्राएल पर अधिक दबाव है और वह हमारे पक्ष में दबाव बना सकता है.”

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