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फ़ातिमा नगर में रियासत का उर्दू का पहला क़ौमी मॉडल स्कूल

नुमाइंदा ख़ुसूसी- 60 साल के तवील इंतिज़ार के बाद 14 जुलाई 2007 -को उर्दू का पहला क़ौमी मॉडल स्कूल का क़ियाम शहर हैदराबाद में अमल में आया था। जिस का इफ़्तिताह साबिक़ वज़ीर-ए-आला आँजहानी डाक्टर राज शेखर रेड्डी के हाथों हुवा। स्कूल की वसी

नुमाइंदा ख़ुसूसी- 60 साल के तवील इंतिज़ार के बाद 14 जुलाई 2007 -को उर्दू का पहला क़ौमी मॉडल स्कूल का क़ियाम शहर हैदराबाद में अमल में आया था। जिस का इफ़्तिताह साबिक़ वज़ीर-ए-आला आँजहानी डाक्टर राज शेखर रेड्डी के हाथों हुवा। स्कूल की वसीअ-ओ-अरीज़ और पुरशिकवा इमारत को देख कर वज़ीर-ए-आला को ख़ुद एतराफ़ करना पड़ा था कि पूरी रियासत में किसी सरकारी स्कूल की इतनी शानदार इमारत नहीं है। उन्हों ने इस इमारत को देख कर बहुत ज़्यादा ख़ुशी और मुसर्रत का इज़हार किया था। चूँकि रियास्ती हुकूमत की जानिब से चलाए जाने वाले तमाम सरकारी स्कूलों में मिड डे मेल्स (दोपहर का खाना) का नज़म किया जाता है।

इस लिए साबिक़ वज़ीर-ए-आला ने इफ़्तिताही तक़रीब में फ़ीता काटने के फ़ौरी बाद ये ऐलान किया कि यहां भी तलबा-ए-ओ- तालिबात के लिए दोपहर के खाने का नज़म किया जाएगा और इस के लिए उन्हों ने ज़िला कलेक्टर को अहकामात भी दिए थे कि वो मर्कज़ी हुकूमत की जानिब से चलाए जाने वाले इस स्कूल में रियास्ती हुकूमत की जानिब से दोपहर के खाने का इंतिज़ाम करें। लेकिन आँजहानी वज़ीर-ए-आला के ऐलान, वाअदा और अहकामात को हनूज़ अमली जामा नहीं पहनाया गया। आज भी स्कूल इंतिज़ामीया के साथ यहां ज़ेर-ए-तालीम ग़रीब तलबा-ए-ओ- तालिबात इस बात के मुंतज़िर हैं कि इस सरकारी वाअदा पर अमल आवरी कब की जाएगा और कब से ग़रीब बच्चों को दोपहर का खाना सरबराह किया जाएगा।

वाज़ेह रहे कि फ़लक नुमा के क़रीब पसमांदा-ओ-पिछड़े तबक़ात की ग़नजान आबादी फ़ातिमा नगर में पहला उर्दू क़ौमी मॉडल मर्कज़ी स्कूल क़ायम है। 6 करोड़ एक लाख रुपय की लागत से तामीर करदा इस 4 मंज़िला वसीअ-ओ-अरीज़ स्कूल की इमारत में मर्कज़ी हुकूमत की जानिब से मौलाना आज़ाद उर्दू यूनीवर्सिटी के सी बी एस सी निसाब पर मबनी उर्दू मॉडल स्कूल चलाया जा रहा है। इस स्कूल में क़ौमी मेयार की हामिल तालीम को यक़ीनी बनाया गया है। सी बी एस सी निसाबको किसी देसी ज़बान में मुंतक़िल नहीं किया गया। लेकिन इस स्कूल के निसाब के लिए पहली मर्तबा उस को उर्दू ज़बान में मुंतक़िल किया गया। ऐसे वक़्त जबकि बच्चों को तालीम दिलाना आसान नहीं आला मेयारी मुफ़्त तालीम एक बड़ा कारनामा है।

इस स्कूल में सी बी एससी निसाब के तहत 10 वीं जमात तक मेयारी तालीम का नज़म है। इलावा अज़ीं यहां पर तलबा को मुफ़्त तालीम के साथ साथ किताबें और दीगर सहूलतें भी फ़राहम की जाएंगी। इस वक़्त इस स्कूल में 740 तलबा-ओ-तालिबात तालीम हासिल कर रहे हैं और इस में कोई शक नहीं कि ये स्कूल तालीमी तक़ाज़ों को कामयाबी के साथ पूरा कररहा है और इस से वाबस्ता उम्मीदें भी पूरी होरही हैं। लेकिन असातिज़ा की सख़्त कमी महसूस की जा रही है। इस में 28 अफ़राद पर मुश्तमिल स्टाफ़ काम कर रहा है जिस में 6 असातिज़ा मुस्तक़िल हैं। 12 कंट्टर एक्ट की बुनियाद पर काम कर रहे हैं। जिन्हें फ़ी क्लास 110 रुपय पेश किए जाते हैं।

सरपरस्तों की शिकायात के साथ साथ स्कूल इंतिज़ामीया भी इस बात को क़बूल करता है कि 740 तलबा-ए-ओ- तालिबात के तनासुब से 28 असातिज़ा बहुत कम हैं। मज़ीद असातिज़ा की तक़र्रुरी अमल में आनी चाहीए। कम अज़ कम 70 असातिज़ा की ज़रूरत है। नीज़ 28 असातिज़ा में से भी हैदराबाद से ताल्लुक़ रखने वाले बराए नाम ही हैं। अक्सर महबूबनगर, नलगुनडा, करीमनगर और चंद बिहार के भी असातिज़ा हैं और प्रिंसिपल डाक्टर कफ़ील अहमद का ताल्लुक़ भी बिहार से है। नीज़ सरपरस्तों के मुताबिक़ तलबा-ए-ओ- तालिबात को बैरून हैदराबाद के असातिज़ा होने की बिना पर अस्बाक़ के समझने में दुशवारी पेश आरही है।

मालूम रहे कि इस तर्ज़ के हिंदूस्तान भर में सिर्फ 3 स्कूल चल रहे हैं। एक दरभंगा (बिहार), दूसरा नूह (हरियाणा) और तीसरा हैदराबाद में। प्रिंसिपल कफ़ील अहमद ने अख़बार सियासत के ज़रीया अवाम और मुताल्लिक़ा मह्कमाजात तक ये बात पहुंचाना चाहते हैं कि स्कूल के बाब उल दाखिला पर कचरा की कुंडी है जहां पूरे मुहल्ला का कूड़ा कचरा लाकर डाला जाता है जिस की वजह से गंदगी बहुत ज़्यादा फैल रही है। उन्हों ने कहाकि हमारी जानिब से बलदिया को इस हवाला से बार बार इत्तिला दी गई लेकिन इस पर कोई तवज्जा नहीं दी गई जो बाइस अफ़सोस है। इफ़्तिताही तक़रीब की मुनासबत से आँजहानी वज़ीर-ए-आला ने कई एक वाअदे किए थे जिन में मिड डे मेल्स के साथ ये भी था कि इस तर्ज़ के रियासत में मज़ीद स्कूल क़ायम किए जाऐंगे लेकिन ये तमाम वाअदे वफ़ा ना होसके।

स्कूल इंतिज़ामीया ने बताया कि एक नहीं चार मर्तबा दोपहर के खाने के ताल्लुक़ से रियास्ती हुकूमत से नुमाइंदगी की जा चुकी है लेकिन इस का कोई बेहतर जवाब और मुसबत रद्द-ए-अमल उन की जानिब से नहीं आया। ये बच्चे ग़ुर्बत की बिना पर इस के मुस्तहिक़ हैं। अगर रियास्ती हुकूमत उन के लिए मिड डे मील्स फ़राहम करती तो बहुत बेहतर होता लेकिन वाअदे करना, सबज़ बाग़ात दिखाकर अवाम को मुतवज्जा करना कांग्रेस हुकूमत का शेवा बन चुका है। ये हुकूमत सिर्फ वादों तक ही महदूद है। आज 3 साल होचुके अभी तक मिड डे मील्स सरबराह करने का इस का वाअदा पूरा नहीं हुआ ।

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