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फांसी की सजा पाने वाले 76 फीसदी निचली जाती और अल्पसंख्यक समुदाय से- रिसर्च

नई दिल्ली। किसी मंत्रालय या सरकारी एजेंसी के पास इस बात का कोई रेकॉर्ड नहीं है कि आजादी के बाद से भारत में कितने लोगों को फांसी पर लटकाया गया है। आंकड़ें बहुत कम हैं और ऐसी कहानियां भी अनसुनी ही हैं।

दिल्ली की नैशनल लॉ यूनिवर्सिटी के डेथ पेनल्टी प्रॉजेक्ट में पहली बार इस विषय पर डीटेल स्टडी की गई है। जुलाई 2013 और जनवरी 2015 के बीच NLU, दिल्ली ने आधिकारिक आंकड़ें इकट्ठे किए और सजा-ए-मौत पाने वाले अभियुक्तों और उनके परिवारवालों से मुलाकात की।

NLU के प्रफेसर अनूप सुरेंद्रनाथ कहते हैं, हमें जो बताया गया, वह बेहद विचलित कर देने वाला था। मुझे लग रहा था कि जैसे मैं कैंची के दो ब्लेड के बीच फंस गया हूं और मेरे पास वहां से निकलने के लिए कोई रास्ता नहीं है।

मौत की सजा पाने वाले तकरीबन तीन चौथाई कैदी आर्थिक रूप से कमजोर तबके से आते हैं। इनमें से 61.6 फीसदी कैदियों ने सेकंडरी स्कूल पास नहीं किया था।

स्टडी के अनुसार इन कैदियों में 76 फीसदी निचली जातियों और धार्मिक अल्पसंख्यक समुदाय से आते हैं। हालांकि अध्ययन में किसी तरह के भेदभाव की बात नहीं कही गई है लेकिन उनकी अपनी दिक्कतों और क्रिमिनल जस्टिस सिस्मटम की खामियों के बीच तालमेल दिखता है।

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