फिर विवादों में AMU, छात्रों का आरोप, जिस तेल से चिकन पकाया जाता उसी से बनायी जाती हैं पूड़िया

फिर विवादों में AMU, छात्रों का आरोप, जिस तेल से चिकन पकाया जाता उसी से बनायी जाती हैं पूड़िया

अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी एक बार फिर विवादों में घिर गयी है। इस बार मामला यूनिवर्सिटी के मेस से जुड़ा हुआ है। एएमयू में पढ रहे हिंदू छात्रों ने आरोप लगाया है कि जिस तेल में चिकन पकाया जाता है, उसी में उनके लिए सब्जी पूड़ी बनाई जाती है। इस पर उन छात्रों ने जमकर बवाल किया तथा धर्म भ्रष्ट करने का आरोप लगाया। छात्रों ने कुलपति प्रो. तारिक़ मंसूर से मिलकर इस मामले की लिखित शिकायत की।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, यह पूरा मामला यूनिवर्सिटी के एसएस नॉर्थ का है। इस हॉल में रहने वाले छात्र गनेशी लाल (एमएड) ने बताया कि सुबह साढे पांच बजे उनके पास डाइनिंग हाल के स्टॉफ मनोज का फोन आया। फोन पर उसने बताया कि जो तेल पूड़ी तलने के लिए मिला है, वह काला और खराब है। यह सूचना पाकर गनेशी अपने मित्र विनय गोविल व अन्य छात्रों के साथ डाइनिंग हाल पहुंचे, तो देखा कि वह काला तेल वहीं रखा था, जिससे एक दिन पहले चिकन पकाया गया था और उसी तेल से शाकाहारी छात्रों के लिए सब्जी-पूड़ी बनाई गयी है। छात्रों के मना करने बावजूद उस तेल से उनके लिए खाना तैयार किया गया।

गुस्साए छात्रों ने डाइनिंग हाल में मौजूद जब नासिर और ज़फीर से इस बाबत पूछताछ की तो उन्होंने ने भी स्वीकार किया कि जिस तेल में सब्जी पूड़ी तैयार की गई है, उसमे एक दिन पहले चिकन पकाया गया था। यूनिवर्सिटी प्रशासन की तरफ से कोई ठोस कदम न उठाने पर छात्रों ने मीडिया को बुलाकर यह जानकारी दी। छात्रों की मांग है कि शाकाहारी छात्रों के लिए अलग से व्यवस्था की जाए। रसोइए ने जानबूझकर ऐसी हरकत की है। उसकी इस हरकत से छात्रों को न चाहते हुए भी मीट के तेल में बनी पूड़ियाँ खानी पड़ रही हैं और छात्र मानसिक दबाव महसूस कर रहे हैं।

बता दें कि इस तरह का यह कोई पहला मामला नहीं है। रमज़ान के दौरान भी हिन्दू छात्रों को सुबह का नाश्ता और दोपहर का भोजन न मिलने की खबरें भी आ चुकी हैं। रमज़ान में कैंपस के भीतर इस कदर धार्मिक माहौल रहता है कि छात्रों के मन में एक किस्म का डर बना रहता है। अगर कोई मुस्लिम साथी रोज़ेदार हो तो उसके सामने कुछ खाने में या फिर पानी पीने में भी अजीब लगता है कि कहीं वो आपत्ति न जता दे! यही नहीं, शुक्रवार को मध्यांतर के बाद जुमे की नमाज़ की छुट्टी दे दी जाती है। इस दौरान भी कैंपस की सारी कैंटीन बंद रहती हैं।

एएमयू के पूर्व छात्र एवं हिन्दूस्तान टाइम्स के पत्रकार जबी अफ़ाक के अनुसार, “कैंपस में एक मज़हब का बोलबाला रहता है। रमजान के दौरान अगर आपको कुछ खाना है तो छुपकर खाना होगा। कैंपस में सारी कैंटीन बंद रहती है। यूनिवर्सिटी के बाहर ढाबों पर भी शाम के समय पर्दे लग जाते हैं। ऐसे में दूसरे धर्म के लोगों को काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है।” इस यूनिवर्सिटी का आलम यह है कि दूसरे कैंपस में आप धर्म की आलोचना कर सकते हैं, लेकिन यहां ऐसा करने से पहले आपको 100 बार सोचना पड़ेगा। यहाँ लोग पुस्तकालय में भी नमाज़ कदा करते हैं। हिन्दू छात्रों को ऐसा लगता है कि वो किसी मजहबी संस्थान में पढाई कर रहे हैं।

”मई, 2017 में यूनिवर्सिटी के केनेडी हॉल में अभिनेता नसीरुद्दीन शाह आए थे। केनेडी हॉल में लड़कियों को स्कार्फ़ और पुरुषों के लिए टोपी पहनने की परंपरा है। जब नसीरुद्दीन ने बोलना शुरू किया तो लोगों ने टोपी-टोपी की आवाज़ लगाई। नसीर कुछ देर तक चुप रहे। जब आवाज़ ख़त्म हुई तो नसीर ने पूछा – हो गया न? उन्होंने टोपी नहीं पहनी और बोलना शुरू किया।”

एएमयू के ही पूर्व छात्र एवं वर्तमान पत्रकार, पुष्पेंद्र कुलश्रेष्ठ, जिनका जन्म और शूरू से लेकर अंतिम तक पूरी शिक्षा यूनिवर्सिटी कैंपस में ही हुई। उन्होंने एक गोष्ठी में भी अपनी बात रखते हुआ कहा, “मेरा जन्म एएमयू कैंपस में ही हुआ और पूरी पढाई भी यहीं हुई। पूरे कैंपस में सिर्फ मेरा हिन्दू परिवार था। एक बार मेरे कुछ मुस्लिम साथी मेरे कमरे में आए और मुझसे कहा कि कल तुम्हें नमाज़ पढना है। मैंने कहा ठीक है। शाम को मेरा एक घनिष्ठ मित्र मेरे पास आया। मैनें उसे यह बात बताई। उसने कहा कि ठीक है। कल देखते हैं। अगले दिन वो मुस्लिम साथी नमाज़ पढने आए। मेरे मित्र ने मुझसे कहा कि पुष्पेंद्र, तुम्हें हनुमान चालीसा नहीं पढना है! तुम्हारे हनुमान चालीसा का समय हो गया। मैनें हनुमान चालीसा जैसे ही पढना शूरू किया, वो सभी नमाज़ी भाग खड़े हुए।”

यूनिवर्सिटी प्रशासन एवं छात्रसंघ पदाधिकारियों से जब ऐसे मामलों में पूछा जाता है, तो उनका जवाब होता है, “इस यूनिवर्सिटी को अल्पसंख्यक संस्थान का दर्जा मिला हुआ है और इसे बरकरार रहने देना चाहिए।” लेकिन इन महानुभावों को यह नहीं पता कि अल्पसंख्यक संस्थान का मतलब यह नहीं कि पूरे मज़हबी तौर तरीके दूसरे धर्म के छात्रों पर थोपा जाए। अगर अल्पसंख्यक संस्थान के बहाने मज़हबी तौर तरीके थोपना चाहते हो, तो सबसे पहले केंद्र सरकार से जो तुम्हें खर्च (यूनिवर्सिटी का खर्च) मिलता है, उसे तुम्हें बंद करना होगा। सरकारी पैसे पर मज़हबी नियम कायदे लागू क्यों?

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