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फिल्म ‘पद्मावती’ से जुड़ा एक और खुलासा, पद्मिनी असल में श्रीलंका से थीं

नई दिल्ली: संजय लीला भंसाली की ‘पद्मावती’ से जुड़ा ऐसा खुलासा हुआ है, जिसे जानकर आप भी हैरान रह जाएंगे. जब से संजय लीला भंसाली ने ‘पद्मावती’ पर काम शुरू किया है तब से फिल्म किसी न किसी वजह से विवाद में रही है. आज नवरात्रि के पहले दिन संजय लीला भंसाली ने ‘पद्मावती’ का पहला लुक रिलीज किया तो हंगामा हो गया. हर तरफ पद्मावती के चर्चे हो गए. दीपिका पादुकोण लग ही इतनी खूबसूरत रही थीं. लेकिन इसके साथ ही फिल्म की टीम ने एक और खुलासा भी कर दिया है. फिल्म की पीआर टीम की ओर से जारी विज्ञप्ति में इस बात का खुलासा कर दिया गया है कि रानी पद्मावती असल में कहां से थीं.

संजय लीला भंसाली ने पद्मावती के लुक के लिए काफी मेहनत की है. दीपिका पादुकोण के मेकअप से लेकर उनके कॉस्ट्यूम्स तक का खास ख्याल रखा गया है. फिल्म से जुड़े सूत्रों ने बताया है, “हमने रानी पद्मिनी पर काफी रिसर्च की है. वे किस तरह के कपड़े पहनती थीं और कैसा मेकअप करती थीं. उस समय महिलाएं प्राकृतिक संसाधनों से अपनी ब्यूटी को निखारती थीं. भंसाली ऐसा ही कुछ चाहते थे. इसलिए दीपिका ने इस रोल के लिए बहुत ही कम मेकअप का इस्तेमाल किया है. उन्हें तैयार होने में सिर्फ 30 मिनट लगते थे.”

दिलचस्प बात यह है कि मेवाड़ की रानी पद्मिनी के परिधानों को सिंहली स्टाइल का बनाया गया है. आप पूछेंगे सिंहली क्यों तो फिल्म से जुड़े सूत्रों ने खुलासा किया, “पद्मिनी असल में श्रीलंका से थीं, इसलिए उनके परिधानों को सिंहली टच दिया गया है. हालांकि वे पूरी तरह से शाही राजपूताना शैली के हैं.” वाकई यह कमाल की बात है कि पद्मिनी श्रीलंका से थीं, और अब इस लासे के बाद तो फिल्म को देखना और भी दिलचस्प हो जाएगी.

पद्मिनी कहां पैदा हुईं,इसे लेकर इतिहासकारों में कई अलग-अलग मत हैं

पद्मिनी सिंहल द्वीप के राजा गंधर्व सेन की बेटी थी, जिनकी शादी मेवाड़ के रावल रतन सिंह से हुई। सिंहल द्वीप को आज श्रीलंका के रूप में पहचाना जाता है। कुछ इतिहासकारों का मानना है कि पद्मिनी मध्यप्रदेश के सिंगोली गांव की थी, जो राजस्थान में कोटा के नजदीक है। उस दौरान यहां चौहानों का शासन था और एक किला भी बना हुआ था, जिसके अवशेष आज भी मिलते हैं।
राजस्थान के एक इतिहासकार का मानना है कि पद्मिनी जैसलमेर के रावल पूरणपाल की बेटी थीं, जिन्हें 1276 में जैसलमेर से निर्वासित कर दिया गया था। उन्होंने पूंगल प्रदेश में अपना ठिकाना बनाया। ये जगह बीकानेर के चमलावती और रमनेली नदियों के संगम पर बसा पड़केश्वर था। यह बीकानेर से खाजूवाल मार्ग पर 50 किमी पश्चिम में है।

इन्होंने पद्मिनी के होने पर उठाए सवाल

पिछले दिनों एक अंग्रेजी अखबार ने इतिहासकारों के हवाले से लिखा था कि पद्मिनी असल में नहीं थी, बल्कि मशहूर सूफी कवि मलिक मोहम्मद जायसी के 1540 में रचे काव्य ‘पद्मावत’ का काल्पनिक कैरेक्टर था। जायसी के इस महाकाव्य पर हिंदी साहित्यकार आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने टीका और समीक्षा भी की है।
सीनियर हिस्टोरियन इरफान हबीब ने भी उदयपुर में दावा किया है कि जिस पद्मावती के अपमान को मुद्दा बनाकर करणी सेना और दूसरे संगठन हंगामा मचा रहे हैं, वैसा कोई कैरेक्टर असलियत में था ही नहीं, क्योंकि पद्मावती पूरी तरह से एक काल्पनिक चरित्र है।
इरफान के मुताबिक, इतिहास में 1540 से पहले पद्मावती का कोई रिकॉर्ड नहीं मिलता है।
गीतकार जावेद अख्तर ने भी पिछले दिनों ट्वीट किया- ‘पद्मावत इतिहास नहीं, बल्कि एक काल्पनिक कहानी है। पद्मावत पहला हिंदी नॉवल है, जिसे मलिक मोहम्मद जायसी ने अकबर के दौर में लिखा था। यह बिल्कुल वैसे ही है जैसे कि अनारकली और सलीम।’
एक अन्य ट्वीट में जावेद ने लिखा, ‘खिलजी मुगल नहीं थे, वे तो मुगलकाल से 200 साल पहले हुआ करते थे।’

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