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बंगलादेश के जमात-ए-इस्लामी सरबराह की सज़ा-ए-मौत बरक़रार

ढाका 07 जनवरी: बंगला देश के सुप्रीमकोर्ट ने बुनियाद परस्त जमाते इस्लामी के एक सरकरदा लीडर को 1971 में पाकिस्तान के ख़िलाफ़ लड़ी गई जंग आम्मा दी के दौरान जंगी जराइम के इर्तिकाब पर दी गई सज़ा-ए-मौत को जायज़ क़रार दिया जिसके साथ ही उन्हें फांसी पर लटकाए जाने की राह हमवार हो गई है।

जस्टिस एसके सहना के ज़ेर-ए-क़ियादत चार रुकनी बैंच ने जमाते इस्लामी के सरबराह मुतीअ अल रहमान की अपील मुस्तर्द कर दी। मुतीअ अल रहमान निज़ामी ने अपनी बेरहम-ओ-रुस्वा-ए-ज़माना तंज़ीम अलबदर मलेशिया का इस्तेमाल करते हुए 1971 मैं बंगलादेश की कई इंतिहाई काबुल और ज़हीन शख़्सियात का क़त्ल-ए-आम किया था। इस्तिग़ासा के सीनीयर वकील जय्यद अलमलोम ने पी टी आई से कहा कि अदालत अज़मी ने इन ( मुतीअ ) की सज़ा-ए-मौत पर महर सब्त कर दी। क़ब्लअज़ीं जंगी जराइम के बैन-उल-अक़वामी ट्रिब्यूनल ने उन्हें ये सज़ा-ए-मौत दी थी।

इस फ़ैसले के ख़ौरमक़दम के लिए अवाम की कसीर तादाद अदालत के अहाता में जमा हो चुकी थी जहां सख़्त तरीन पहरा दिया जा रहा था।

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