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बच्चों की फीस अदा करने के लिए किराये पर दी कोख

मुंबई, 4 जून: मुंबई एक तरफ मुल्क में आरटीई एक्ट के तहत बच्चों को तालीम पाने का कानूनी हुकूक है, दूसरी तरफ बेवजह बढ़ती हुई स्कूली फीस ने मज़बूर वालिदैन को आम तौर पर नामुम्किन नजर आने वाले इख्तेयारात को भी अपनाने के लिए मजबूर कर दिया है

मुंबई, 4 जून: मुंबई एक तरफ मुल्क में आरटीई एक्ट के तहत बच्चों को तालीम पाने का कानूनी हुकूक है, दूसरी तरफ बेवजह बढ़ती हुई स्कूली फीस ने मज़बूर वालिदैन को आम तौर पर नामुम्किन नजर आने वाले इख्तेयारात को भी अपनाने के लिए मजबूर कर दिया है।

स्कूल जाते तीन बच्चों की ऐसी ही एक मजबूर मां ने अपने लाडलों की पढ़ाई जारी रखने के लिए निरंकुश निजी स्कूल की फीस चुकाने की खातिर तीन लाख रुपये में अपनी कोख का ही सौदा कर डाला। इस वक्त यह 30 साला मां आठ महीने की हामिला है।

मज़ाक/ बिडंबना! पैदाइश के बाद यह मां अपने इस बच्चे को पैसे के बदले विदेशी जोड़े को सौंप देगी। स्कूल की फीस नहीं चुका पाने की वजह से रागिनी (बदला हुआ नाम) के एक बेटे को कुछ वक्त पहले स्कूल से निकाल दिया गया। इसके बाद उसके सिर पर बाकी बच्चों को स्कूल से निकाले जाने की तलवार लटक रही थी। उसने कई जानने वालों से मदद मांगी।

उसने बैंकों के भी काफी चक्कर लगाए। हर तरफ से मायूस होने के बाद रागिनी ने सरोगेट मदर बनने का फैसला किया। रागिनी के तीनों बच्चों की सालाना फीस करीब 30 हजार रुपये है। वह अपने एक बेटे की तरह बाकी दोनों बच्चों को भी स्कूल से निकाले जाते हुए नहीं देखना चाहती थी।

इसी दौरान रागिनी की एक दोस्त ने बताया कि वह अपने मां बनने में नाकाबिल खातून को डोनेट कर दे, लेकिन इससे मिलने वाली रकम काफी कम थी। इसके कुछ दिनो के बाद किसी ने रागिनी को सरोगेसी और अच्छी अदायगी के बारे में बताया। हालांकि, सरोगेट मदर बनने का आखिरी फैसला लेने में रागिनी को दो महीने का वक्त लगा, क्योंकि उसका शौहर इसके लिए तैयार नहीं था। अपने बच्चों की पढ़ाई जारी रखने की जिद पर अड़ी रागिनी ने आखिरकार फैसला ले ही लिया।

रागिनी पढ़ाई की अहमियत को अच्छे से समझती है, क्योंकि उसके वालिदैन ने उसके छह भाइयों को तो पढ़ाना जरूरी समझा, लेकिन उसे और उसकी बहन को घर पर ही रखा। वह जानती है कि अनपढ़ शख्स ताउम्र गरीबी के दलदल में ही फंसा रहता है। रागिनी का कहना है कि वह पहली बार ऐसे तजुर्बे से दो-चार होगी, लेकिन अपने बच्चों के लिए भी कुछ भी करने को तैयार है।

उसने कहा कि मेरा छोटा बेटा मुझसे स्कूल बैग, किताबें और यूनीफॉर्म मांगता है और मैं उससे नहीं कह पाती। लिहाजा, जब उन्होंने मुझसे सरोगेसी के लिए पूछा तो मैंने इन्कार नहीं किया। रागिनी एक कमरे के घर में रहती है, जिसे फौरन मरम्मत की दरकार है,उसे सिर्फ अपने बच्चों की फीस चुकाने की धुन है।

डॉ. गोरल गांधी ने बताया कि सरोगेट मदर को लेकर हर अस्पताल की पालिसी अलग है। बच्चा लेने वाले जोड़े को खातून से मिलने और बात करने की इज़ाज़त दी जाती है। उनके मुताबिक, ज्यादातर गरीब तबके की ख़्वातीन ही सरोगेट मदर बनने के लिए आगे आ रही हैं।

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