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बाग-ए-आम की तकमील 1874 में, शाही मस्जिद की तामीर 1924-में

हैदराबाद की तहज़ीब , सक़ाफ़्त और तर्ज़-ए-सहाफ़त आलमी उफ़क़ पर एक नुमायां मुक़ाम और एहमीयत की हामिल है। इस शहर की तहज़ीबी और बलदी तारीख़ को एहतियात से मुरत्तिब किया जाना चाहीए कि आज की तहरीर मुस्तक़बिल की तारीख़ का हवाला बन सकती है

हैदराबाद की तहज़ीब , सक़ाफ़्त और तर्ज़-ए-सहाफ़त आलमी उफ़क़ पर एक नुमायां मुक़ाम और एहमीयत की हामिल है। इस शहर की तहज़ीबी और बलदी तारीख़ को एहतियात से मुरत्तिब किया जाना चाहीए कि आज की तहरीर मुस्तक़बिल की तारीख़ का हवाला बन सकती है। ऐसे में नौ आमोज़ अहल-ए-क़लम को चाहीए कि वो बिला तहक़ीक़ महज़ क़ियास की बिना पर सनसनीखेज़ तहरीरों से अहितराज़ करें और मुख़ालिफ़ीन के इरादों की तक़वियत का बाइस ना बनें।

इन ख़्यालात का इज़हार करते हुए अल्लामा एजाज़ फ़र्ख़ु ने कहा कि बाग-ए-आम की ज़मीन 1864 -में इस के पट्टादार बालकिशन से ख़रीदी गई जो एक बबूल बन था। मीर महबूब अली ख़ां आसिफ़ सादस ने ज़र-ए-कसीर ख़र्च करके उसे गुलशन की सूरत दी और ये 1874-में तकमील को पहुंचा। आसिफ़ साबह मीर उसमान अली ख़ां चूँकि किंग कोठी में मुक़ीम थे, उन्हों ने नमाज़-ए-जुमा के लिए शाही मस्जिद बाग-ए-आम की बुनयाद रखी जो 1343ह मुताबिक़ 1924- में मुकम्मल हुई।

उस की तारीख़ बन गई बाग-ए-आम की मस्जिद से बरामद होती है। निज़ाम ने इस मस्जिद के पहले ख़तीब के तौर पर मौलाना अबदुर्रहमान बिन महफ़ूज़ अलहमोमी का तक़र्रुर फ़रमाया। अल्लामा ने कहा कि उन की अगली किताब गलगशत बहुत जल्द मंज़रे आम पर आरही है जो हैदराबाद की बलदी इमारतों और शहर नशीनी की तारीख़ का अहाता करेगी।

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