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बालू घाटों की नीलामी मंसूख होगी

रियासत के काबीना ने जुमेरात को पंचायतों को बालू घाटों का हक़ देने के साथ ही अब तक हुई बालू घाटों की नीलामी मंसूख करने का फैसला किया। बैठक में बालू का उठाव और ईंट की तामीर की महुलियात मंजूरी के लिए फीस की रकम तय की गयी। बालू के मुद्दे

रियासत के काबीना ने जुमेरात को पंचायतों को बालू घाटों का हक़ देने के साथ ही अब तक हुई बालू घाटों की नीलामी मंसूख करने का फैसला किया। बैठक में बालू का उठाव और ईंट की तामीर की महुलियात मंजूरी के लिए फीस की रकम तय की गयी। बालू के मुद्दे पर उभरे तनाजे पर गौरो खौस के बाद फैसले लिये गये। तय किया गया कि बालू घाटों का हक़ अब पंचायतों को ही मिलेगा। इसके साथ ही जिला इंतेजामिया की तरफ से अब तक की गयी बालू घाटों की नीलामी को असुलों के मुताबिक मंसूख किया जायेगा। हालांकि बालू के मुद्दे पर फैसले के लिए कैबिनेट की बैठक में संलेख पेश नहीं किया गया था। इसलिए बहस के बाद इसे दीगर मद में फैसले के तौर में शामिल किया गया।

13 साल में झारखंड को बालू से सिर्फ 6.25 करोड़

झारखंड काबीना ने बालू की नीलामी मंसूख कर इसका हक़ पंचायतों को सौंपने का जो फैसला किया है, उसके बाद यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या बालू की फरोख्त से जो पैसा आयेगा, वह पंचायतों को असल में मिलेगा या फिर बालू माफिया राज करेंगे। मुल्क के 28 में से 26 रियासत बालू की नीलामी कर करोड़ों का आमदनी कमा रहे हैं, जबकि झारखंड में बालू का पैसा किसकी जेब में गया है, इसका पता भी नहीं चल रहा है। अदाद बताते हैं कि 13 साल में झारखंड में बालू से हुकूमत को महज़ 6.25 करोड़ की आमदनी हुई है, जबकि पड़ोसी रियासत बिहार हर साल तकरीबन 200 करोड़ बालू से कमा रहा है। विशेषज्ञ बताते हैं कि झारखंड में बालू से कमाई तो हो रही है, पर यह पैसा पंचायत, ग्राम सभा या हुकूमत के खाते में नहीं जा रहा है। महज़ बिहार ही नहीं, गुजरात, पंजाब समेत दीगर रियासत भी बालू की नीलामी से बड़ी रकम कमा रहे हैं।

पंजाब को 100 करोड़ की रायल्टी मिली :

जब बिहार से झारखंड अलग हुआ था, तो कहा गया था-बिहार के लोग बालू फांकेंगे? पर इसी बिहार ने बालू को रियासत की आमदनी का बड़ा जरिया बना लिया है। वहां नयी पॉलिसी बन रही है। अगर इसे पूरी तरह से लागू कर दिया जायेगा, तो बालू से बिहार को हर साल 500 करोड़ से ज्यादा की आमदनी होगी। मुल्क के दीगर रियासत भी इसमें पीछे नहीं हैं। गुजरात में बालू घाटों से 114 करोड़ रुपये की आमदनी होती है, जबकि पंजाब को गुजिशता माली साल में 100 करोड़ रुपये का आमदनी मिला था।

साल 2012 में बालू पॉलिसी के इब्तेदाई तजवीज पर वजीरे आला ने एतराज़ जताते हुए इसमें और बेहतरी करने की हिदायत दिया। तब महकमा ने इस साल 2013 के लिए गुजिशता साल से 20 फीसद ज़्यादा शरह पर बालू घाटों का ठेका पुराने ठेकेदारों को ही दिया। इस साल अगस्त में रियासती हुकूमत की नयी बालू पॉलिसी बन कर तैयार हो गयी। काबीना से पारित होने के बाद उसकी नोटिफिकेशन जारी की गयी। लेकिन, इसी दौरान सुप्रीम कोर्ट ने बालू घाटों की बंदोबस्ती के लिए महुलियात मंजूरी और माइनिंग प्लान को लाज़मी बना दिया। यह मंजूरी सेंटर से लेनी है। इसमें लगने वाले वक़्त से फिक्रमंद महकमा ने सुप्रीम कोर्ट में नवंबर में एक दरख्वास्त दायर की। दरख्वास्त में कहा गया है कि महुलियात मंजूरी रियासती हुकूमत से ही लेने की इजाजत दी जाये। अब तक सुप्रीम कोर्ट में बिहार हुकूमत की दरख्वास्त लिस्ट मे शामिल नहीं हो सकी। वहीं, पटना हाइकोर्ट ने बालू घाटों का ठेका तौसिह करने पर रोक लगा दी है। इसे देखते हुए महकमा ने सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने तक 2014 के लिए पुरानी पॉलिसी के मुताबिक ही बालू घाटों का ठेका करने का फैसला लिया।

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