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बिजनौर में मुसलमान की लड़की छेड़ी, तीन मरे भी लेकिन उन्होंने मुजफ्फरनगर जैसा दंगा नहीं किया

बिजनौर। 16 सिंतबर की सुबह पश्चिमी उत्तर प्रदेश के बिजनौर जिले के पेदा गांव में शुक्रवार को एक समुदाय विशेष के लोगों ने दुसरे समुदाय के लोगों पर तकरीबन 1 घंटे तक अंधाधुन्द फायरिंग की और ईटें पत्थर बरसाए। ये गांव जिला मुख्यालय से महज़ 3 किलोमीटर की दूरी पर है। 4 जगह से गोलियां चली। 3 घरों से और एक नीम के पेड़ पर से। एक ही परिवार के 3 लोग मारे गए। जो बच गए उनके शरीर में अभी भी गोलियों के छर्रे है।

3 हफ्ते बाद भी पैदा गांव के उस मकान को देखकर ऐसा लगता है जैसा ये घटना आज की ही है। अपने दो बेटों और एक पोते को खो देने वाली हसीना की आंख अभी भी रोअंदी बनी हुई। घर वाले बताते हैं घटना के बाद से ही 70 वर्षीय हसीना चुप हैं। छत के एक कोने में पड़ी हसीना से जब इस घटने के बारे में सवाल किया गया तो मुझे भी इसका कोई जवाब नहीं मिला। लेकिन हसीना की आंखे साफ बयान कर देती है कि उस दिन क्या हुआ था।

पैदा गांव जाट बहुल इलाका है मुस्लिम समाज के मुकाबले आर्थिक तौर पर जाट मजबूत हैं। जहां ये घटना हुई वहां एक्का दुक्का घर मुसलमानों का है। इन घरों की रोजी- रोटी भी जाट के खेतो में मजदूरी करके या उनके कारोबार में हाथ बटाकर कर ही चलती है। जब से यह घटना हुई उन परिवारों के रोजगार के लाले पड़े है। फिलहाल उस परिवार का कोई भी सदस्य रोजगार नहीं कर रहा है।

हसीना के परिवार के आधा दर्जन लोग बिस्तर में पड़े है। 22 साल के अन्सार के पेट में गोली लगने की वजह सर्जिकल ट्यूब लगा है। बाकी तीन के शरीर में अभी मे गोलियों के छर्रे मौजूद है। दुसरी तरफ हत्याकांड के आरोपी 28 जाटों ने थाने में सरेंडर कर दिया है।

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अन्सार ने बताया कि वह पास की ही फैक्ट्री में काम करता था। 3 हफ्तों से वह बिस्तर पर ही है। अन्सार कहता है कि फैक्ट्री जाने लायक मैं कब हो जाउंगा मुझे नहीं पता। प्रशासन की तरफ से दिये गये 5 लाख में 3.50 लाख मेरे इलाज में खर्च हो गया। इलाज के लिए अलग से कोई मदद की मांग करने पर प्रशासन मुआवजे की रकम से ही काम चलाने को कहती हैं जो कि काफी नहीं है।

घर के सामने ही जाटों के मकान है। अन्सार के चाचा मोहम्मद आसिफ बताते हैं ज्यादातर लोग ऐसे थे जिनकी शक्ल मैं रोज देखता था ऐसा कभी नहीं सोचा था कि ये जानी पहचानी शक्ल कभी मेरे घर में बंदुक की गोलियों और पत्थरों से हमला करेगी।

मेरे साथ मानवअधिकार कार्यकर्ता जॉन दयाल भी थे। पीड़ित के घर भय माहोल देखकर उन्होंने मुझसे कहा, ” अक्सर लोग मुझपर तंज करते हुए कहते हैं आप मुस्लमानों के साथ क्यों खड़े होते हैं ये लोग आप के ही धर्म (ईसाई) के लोगों सीरिया, यमन, इराक में कत्ल कर रहे हैं। मैने उन्हें हसतें हुए कहता हूं कि मैं मुसलमानों के साथ नहीं बल्कि इस देश के कमजोर लोगों के साथ हूं। यहां तो मुसलमान की लड़की छेड़ी गई, तीन मरे भी लेकिन मुसलमानों ने तो मुज्जफरनगर जैसा दंगा नहीं किया।”
जॉन दयाल कहते हैं मुज्जफरनगर दंगों के बाद से ही पश्चिमी यूपी में जाटों और मुस्लिमों के आपसी भरोसा कम हुआ है जिसका असर पश्चिमी यूपी में दिख रहा है। जाटों के खेतों और फैक्ट्रियों मुस्लिम मजदूरों की संख्या पिछले 3 साल से घटी है। मुस्लिम मजदूरों का पश्चिमी यूपी से पिछले 3 सालों से तेजी से पलायन हुआ है।

एक उजला पहलू ये भी है पैदा की यह घटना पश्चिमी यूपी के माहौल को बिगाड़ने में नाकाम रही है। मुजफ्फरनगर दंगो के बाद बाद हुए लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी को क्लीम स्वीप मिली थी। यूपी में बीजीपी को अच्छी खासी सीट निकलने के पीछे वजह मुजज्फरनगर के दंगे और ध्रुवीकरण की राजनीति बताई जा रही थी लेकिन 2017 में होने वाले विधानसभा चुनाव में सांम्प्रदायिक ताकतों के हजार कोशिशों के बावजूद दंगा नहीं फैल रहा है। लगता है यूपी के लोग सयाने हो गये हैं।

 

(बिजनौर से लौटकर फ़हद सईद की रिपोर्ट)

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