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बिहार काबीना : एक चौथाई यादव, खातून सिर्फ़ दो, मुस्लिम चार

पटना : बिहार में वजीरे आला नीतीश कुमार के काबीना के हल्फबरदारी के साथ ही महकमा का भी बंटवारा हो चुका है। महागठबंधन की तरफ से इंतिख़ाब मैदान में उतरी 25 खातून में से 23 ने जीत दर्ज की, लेकिन काबीना में सिर्फ़ दो खातून को जगह मिली। अनीता देवी राजद कोटे से वज़ीर बनी हैं, जबकि मंजू कुमारी जनता दल (यूनाइटेड) की एमएलए हैं। काबीना में अहम चेहरों में कई नए हैं तो कई चेहरे पुराने और काफ़ी माहिर हैं। हैं.बिहार काबीना में सबसे ज़्यादा नुमायंदगी यादवों को मिला है। 28 मेम्बर में कैबिनेट में सात यादव हैं, जिनमें से दो तो ख़ुद राजद सरबराह लालू प्रसाद यादव के बेटे हैं। काबीना में जदयू की तरफ से शामिल होने वाला एक अहम नाम है जय कुमार सिंह का।
उन्होंने दिनारा से झारखंड के आरएसएस के इंचार्ज माने जाने वाले राजेंद्र सिंह को हराया है। वो पहले भी वज़ीर रह चुके हैं।
कांग्रेस के सीनियर लीडर रहे अवधेश सिंह को भी काबीना में शामिल किया गया है। वे राजपूत जाति के हैं और अपने इलाक़े में काफ़ी मक़बूल है। है. वे वज़ीरगंज एसेम्बली हल्के से हैं। इसके अलावा कांग्रेस के रियासती सदर अशोक चौधरी काबीना में शामिल है। वे दलित तबके से आते हैं। कांग्रेस के दूसरे अहम चेहरों में अब्दुल जलील मस्तान है जो कांग्रेस की तरफ से एक मुस्लिम चेहरा है और काफ़ी एक्सप्रीयेंस लीडर है। उन्होंने सरहदी के इलाक़े में बड़े फर्ज़ से जीत दर्ज की है जहां ओवैसी के असर की बात की जा रही थी। कांग्रेस की तरफ़ से एक ब्राह्मण चेहरा मदन मोहन झा का भी शामिल है जो मिथिलांचल से हैं। वहीं राजद की तरफ से शामिल होने वाले अहम चेहरों में दो तो लालू यादव के बेटों के ही हैं। इसके अलावा अब्दुल बारी सिद्दीक़ी का नाम शामिल है जो राजद के काफ़ी पुराने और सबसे एक्सप्रीयेंस नाम है। वे हमेशा से लालू-नीतीश के करीब रहे हैं। जदयू से आने वाला एक अहम नाम राजीव सिंह उर्फ लल्लन सिंह का है। वे भूमिहार हैं और गुजिशता हुकूमत में भी वज़ीर थे। थे. बीच में उनके रिश्ते जरूर पार्टी के साथ तल्ख़ हुए थे।

इसके अलावा राजद से एक अहम नाम कृष्णनंदन वर्मा का है। काबीना में जो एक अलग बात देखने को मिल रही है वो यह कि दलित नुमायंदगी का चेहरा बदल रहा है। जैसे कांग्रेस से अशोक चौधरी एकदम से निकल के सामने आ रहे हैं। दलितों के जो पुराने चेहरे थे वो मात खा रहे हैं और नए चेहरे सामने आ रहे हैं। जैसे रमई राम तो इंतिख़ाब ही हार गए हैं। श्याम रजक इंतिख़ाब तो जीते हैं, लेकिन अब तक उनका नाम काबीना के लिए नहीं आया है।

उदय नारायण चौधरी जो कि एसेम्बली के स्पीकर थे। वे जीतन राम मांझी से इंतिख़ाब हार गए। महागठबंधन हो या बीजेपी, इनमें से दोनों तरफ से दलितों का नया चेहरा निकलने की पूरी इमकानात बन रही है। इंतिख़ाब में खातून का साथ महागठबंधन को मिला था लेकिन नुमायंदगी के मामले में खातून का चेहरा फिलहाल पीछे नज़र आ रहा है। मुसलमानों का कोई नया चेहरा सामने नहीं आया है। राजद की तरफ से पुराने लोगों को जगह दी गई है। पार्टी के फी रहे इन लोगों ने बुरे वक़्त में भी लालू का साथ नहीं छोड़ा था।

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