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बिहार में अस्थायी शिक्षकों की नियुक्ति स्कूलों की क्षमता के लिए हानिकारक

पटना : डिजिटल इंडिया के इस दौर में शिक्षा व्यवस्था और शिक्षण का तरीका बदल रहा है, लेकिन बिहार में के अस्थायी शिक्षकों की नियुक्ति का मामला स्कूलों की क्षमता को खत्म कर रहा है।

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उधर स्कूलों में छात्रों की संख्या में जरूर बढ़ोतरी हुई है, लेकिन बिहार की शिक्षा दर को लेकर हमेशा बहस होती रही है। हालांकि धीरे-धीरे शिक्षा के मामले में बिहार की तस्वीर बदल रही है।
सरकार की साइकिल और पोशाक योजना ने छात्रों को स्कूलों की दहलीज तक पहुंचने का अवसर प्रदान किया है, जो खासकर लड़कियों की बड़ी संख्या शामिल है, लेकिन ड्रॉप आउट समस्या गरीबी में जी रही आबादी के लिए एक बड़ा सवाल है। पैसा की कमी की वजह से ज्यादातर बच्चे बीच में ही शिक्षा छोड़ देते हैं और परिणाम के रूप में शैक्षिक अभियान को धक्का लगता है और सरकार अपनी योजनाओं में सफल नहीं हो पाती है. उच्चतम शैक्षिक संस्थानों में विशेष रूप से मुस्लिम और गरीब छात्रों की पहुँच आज भी केवल नाम के बराबर है, जबकि उनके लिए दर्जनों योजनाओं को चलाने का दावा किया जाता है।
बिहार में मुसलमानों की 17 प्रतिशत आबादी है और आबादी का बड़ा हिस्सा शैक्षिक दृष्टि से हाशिये पर खड़ा है। लेकिन यह भी सच है कि समय बदलने के साथ साथ समाज के अंतिम पायदान पर खड़ी आबादी शैक्षिक दृष्टि से जागरूक हुई है और इसका विशेष प्रभाव प्राथमिक स्तरों की शिक्षा में देखने को मिल रहा है।
राज्य में लगभग चार हजार मदरसे हैं, 72 अल्पसंख्यक स्कूल हैं और चार अल्पसंख्यक कॉलेज, बाकी सामान्य स्कूल और कॉलेज हैं। बुद्धिजीवियों के अनुसार आर्थिक तंगी के कारण जो बच्चे स्कूलों से बाहर हैं, उन्हें सरकारी स्कूलों में पढ़ाया जा सकता है, लेकिन इस मामले में कोई ठोस रणनीति नहीं है।
दूसरी ओर सरकारी स्कूलों की शैक्षिक सामान्य स्तर पर भी सवाल उठता रहा है। अस्थायी तौर पर बहाल शिक्षकों सामान्य स्तर नहीं हैं, जिसका असर विद्द्यार्थी की शैक्षिक क्षमता पर पड़ता है। उधर अध्यापकों को प्रशिक्षण देने के संबंध में सरकार की ओर से कोई कदम नहीं उठाया जाता है। सरकार छात्रवृत्ति योजना से छात्रों को मदद करने का दावा करती है और कुछ हद तक छात्रवृत्ति छात्रों की मदद भी करता है, लेकिन शैक्षिक क्षमता का अभाव दूर नहीं होता है।

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