Tuesday , April 24 2018

बीजेपी सरकार अपने कर्तव्य का निर्वहन करने में भी रही असमर्थ : 49 रिटाइर्ड वरिष्ठ अफसर

नई दिल्ली : प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार और उनकी भारतीय जनता पार्टी से मोहभंग की प्रक्रिया शुरू हो गयी है. इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि उनके समर्थकों के बीच भी अब यह राय बनती दिख रही है कि उन्होंने अपने वादे पूरे करने की ओर गंभीरता के साथ ध्यान नहीं दिया है और लोग ठगा-सा महसूस करने लगे हैं. फिलहाल तो जम्मू-कश्मीर के कठुआ और उत्तर प्रदेश के उन्नाव में हुए बलात्कार, ह्त्या और पुलिस हिरासत में मौत होने की घटनाओं से लोग विक्षुब्ध हैं, विशेषकर युवा लोग जिन्होंने पिछले लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी के गतिशील नेतृत्व में अपनी गहरी आस्था व्यक्त की थी. लेकिन आज उनमें बढ़ती महंगाई और बेरोजगारी के कारण आक्रोश पनप रहा है. रविवार को देश के विभिन्न छोटे-बड़े शहरों में युवाओं ने कठुआ और उन्नाव की घटनाओं पर अपने-अपने ढंग से विरोध प्रदर्शन किए.

इस बीच 49 अवकाशप्राप्त वरिष्ठ नौकरशाहों ने प्रधानमंत्री को एक खुला पत्र लिखकर अपना असंतोष जताया है और कहा है कि उनकी सरकार अपने बुनियादी कर्तव्य का निर्वहन करने में भी असमर्थ रही है और उन्हें पीड़ितों के परिवारों से माफ़ी मांगनी चाहिए. उन्होंने इस बात पर भी अपना क्षोभ प्रकट किया है कि एक ओर संघ परिवार के भीतर मौजूद शक्तियां साम्प्रदायिक आग को भड़काए रखती हैं और दूसरी ओर घटनाओं के काफी देर बाद अफ़सोस प्रकट किया जाता है और इंसाफ का वादा किया जाता है. इन अवकाशप्राप्त उच्चाधिकारियों ने पिछले वर्ष भी संविधान में निहित धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक और उदारवादी मूल्यों के पतन पर चिंता प्रकट की थी. पत्र पर हस्ताक्षर करने वालों ने कहा है कि उनका किसी भी राजनीतिक दल अथवा विचारधारा के साथ कोई रिश्ता नहीं है और उनकी निष्ठा केवल संवैधानिक मूल्यों के प्रति है. इन मूल्यों की रक्षा करने की शपथ खाने के बावजूद सरकार इनकी हिफाजत में नाकाम रही है.

इन रिटायर्ड वरिष्ठ सरकारी अधिकारियों का कहना है कि स्थिति इतनी भयावह है कि उन्हें उम्मीद की कोई किरण नजर नहीं आ रही है और वे केवल शर्म से गर्दन ही झुका सकते हैं. इसके साथ ही उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी को स्पष्ट शब्दों में यह भी जता दिया है कि शर्म के साथ-साथ उन्हें बेइंतिहा गुस्सा भी है क्योंकि सत्तारूढ़ पार्टी और उससे जुड़े असंख्य संगठन समाज को बांटने के एजेंडे पर काम कर रहे हैं और बहुसंख्यक समुदाय की इच्छा को शेष समाज पर थोप रहे हैं. यह अस्तित्व के संकट का क्षण है, एक निर्णायक मोड़ है, जो देश के भविष्य को तय करेगा. उन्होंने प्रधानमंत्री से कहा है कि वे दलितों समेत समाज के सभी कमजोर तबकों की हिफाजत को सुरक्षित करें और एक सर्वदलीय बैठक बुलाकर नफरत पर आधारित अपराधों को रोकने के तरीके खोजें.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अब तक की कार्यशैली को देखते हुए कतई नहीं लगता कि उन पर इस पत्र कोई ख़ास असर होगा क्योंकि यह पत्र उनसे मांग कर रहा है कि वे हिंदुत्व और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की बुनियादी विचारधारा और जीवनमूल्यों को नकार दें जबकि पिछले सत्तर सालों में पहली बार संघ को यह अवसर मिला है कि वह केंद्र सरकार और अनेक राज्यों में सत्तारूढ़ भाजपा सरकार के माध्यम से अपने एजेंडे को बिना किसी रोकटोक के लागू कर सके. लेकिन पत्र का कुछ असर सेवारत अधिकारियों पर जरूर हो सकता है और उन्हें अपना दायित्व ठीक से निभाने की प्रेरणा मिल सकती है.

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