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बुरहान उद्दीन रब्बानी का क़तल

अफ़्ग़ानिस्तान में अमन के क़ियाम की कोशिशों में नाकामी की असल वजूहात में एक वजह इस शोरिश ज़दा मुल्क में अमरीका की मौजूदगी भी बताई जा रही है। तालिबान के साथ अमन मुज़ाकरात के लिए अमरीका और करज़ई हुकूमत की नुमाइंदगी करने वाले साबिक़ सद

अफ़्ग़ानिस्तान में अमन के क़ियाम की कोशिशों में नाकामी की असल वजूहात में एक वजह इस शोरिश ज़दा मुल्क में अमरीका की मौजूदगी भी बताई जा रही है। तालिबान के साथ अमन मुज़ाकरात के लिए अमरीका और करज़ई हुकूमत की नुमाइंदगी करने वाले साबिक़ सदर बुरहान उद्दीन रब्बानी की हलाकत से अमन के इमकानात दिरहम ब्रहम होने का अंदेशा पैदा होगया, बुरहान उद्दीन रब्बानी को ऐसे वक़्त निशाना बनाया गया जब वो तालिबान के दो अरकान से मुलाक़ात करके शीराज़ा बंदी पर बातचीत कररहे थे। इन की मौत पर हिंदूस्तान ने अफ़सोस का इज़हार किया और अमरीका को इस बात का ग़म है कि उसे एक अच्छे वफ़ादार रुकन से महरूम होना पड़ा। सोवीट यूनीयन के ख़िलाफ़ मुजाहिद बन कर जंग करने और 1992-ता 1996–के दरमयान मुख़्तसर मुद्दत के लिए अफ़्ग़ानिस्तान की सदारत की ज़िम्मेदारी निभाने वाले इस्लामीयात के प्रोफ़ैसर ने 2001-में अफ़्ग़ानिस्तान पर अमरीकी हमले के बाद तालिबान के ख़िलाफ़ ग्रुप में अपनी मौजूदगी के ज़रीया नाराज़गियों को तक़वियत दी थी लेकिन बाद के दिनों में अमरीका ने उन्हें अमन कारकुन बनाकर उन के ज़रीया तालिबान तक रसाई हासिल करने की कोशिश की लेकिन अब उन के जांबाहक़ हो जाने से अफ़्ग़ानिस्तान में अमरीका की मुश्किलात में मज़ीद इज़ाफ़ा होगा। पहले ही वो अपनी तारीख़ के एक बदतरीन शिकस्त से दो-चार होने के दहाने पर पहूंच चुका है। तालिबान ने 10 साल की मुज़ाहमत के ज़रीया अमरीका की सोपर पावर ताक़त को वैतनाम के बाद दूसरी शिकस्त से दो-चार करने का अज़म ज़ाहिर करदिया है। बुरहान उद्दीन रब्बानी को निशाना बनाने से क़बल तालिबान ने काबुल में नाटो हैड क्वार्टर्स और अमरीकी सिफ़ारतख़ाना पर हमले करके ये पयाम दिया था कि इन की लड़ाई ख़तन नहीं हुई है और वो सोपर पावर मलिक को एक और इबरतनाक अंजाम तक पहूँचाने के अह्द को पूरा करना चाहते हैं। अफ़्ग़ानिस्तान के आला सतही अमन कौंसल के चेयरमैन की हैसियत से प्रोफ़ैसर बुरहान उद्दीन रब्बानी ने अहम रोल अदा किया था। वो हाल ही में अफ़्ग़ानिस्तान पहोनचकर तालिबान के साथ मुज़ाकरात और शीराज़ा बंदी की कोशिशों में मसरूफ़ होगए थे। इन की मौत की ज़िम्मेदारी क़बूल करने वालों ने इस जंग ज़दा मुल्क में अपने अज़म को ज़ाहिर करदिया है। इस क़तल ने सदर हामिद करज़ई के लिए भी मुश्किल खड़ी करदी है। तालिबान और पशतून ग्रुप में अर्सा से जारी दुश्मनी का नतीजा ख़ून बहाने पर ही मर्कूज़ रहे तो अमन की बातें करने वाले मुल्कों को इस क़तल के बाद की सूरत-ए-हाल का जायज़ा लेने में देर नहीं करनी चाहिये। अफ़्ग़ानिस्तान में हालिया दिनों में तालिबान ने हुकूमत की सतह के आला ओहदेदारों को निशाना बनाना शुरू किया ही। सदर हामिद करज़ई के सौतेले भाई के क़तल के बाद हलाकतों का सिलसिला जारी है। तालिबान की जानिब से अब तक निशाना बनाए गए क़ाइदीन में हामिद करज़ई के सौतेले भाई को सब से ज़्यादा ताक़तवर और आला लीडर तसव्वुर किया जाता था। इन के बाद शुमाल मग़रिबी अफ़्ग़ानिस्तान में ताजिक ग़लबा से ताल्लुक़ रखने वाले दूसरे आला लीडर बुरहान उद्दीन रब्बानी थे जिन्हों ने सोवीयत यूनीयन से मुक़ाबला करने के बाद तालिबान की हुकूमत से भी नबरद आज़माई शुरू की थी। अफ़्ग़ानिस्तान में तालिबान की हुक्मरानी को ज़वाल से दो-चार करने के लिए वादी बंज शेर के ताक़तवर रहनुमा अहमद शाह मसऊद का क़तल बहाना बन गया। इस के बाद अफ़्ग़ानिस्तान का मंज़र बदलने वाले अमरीका के लिए तालिबान पर क़ाबू पाना मुश्किल अमर बन गया है। बुरहान उद्दीन रब्बानी या किसी और मुज़ाकरात कार के ज़रीया अमरीका ने सब से बड़ी ग़लती ये की कि वो तालिबान के साथ बैयकवक़त मुज़ाकरात और मुक़ाबला आराई कररहा ही। 2013 तक अफ़्ग़ानिस्तान से इत्तिहादी अफ़्वाज के इनख़ला-ए-करने का इरादा रखने वाले अमरीका को बरक़रारी अमन की फ़िक्र लाहक़ है। बुरहान उद्दीन रब्बानी के जांबाहक़ होने के बाद तालिबान के हाथों शिकस्त आलमी ताक़तों के लिए नविश्ता दीवार लग रही ही। हक़ायक़ को तस्लीम करने और मुज़ाकरात के ज़रीया मसला हल करने की हिक्मत-ए-अमली इख़तियार करने में कहीं ना कहीं गलतीयां सरज़द हुई हैं। सब से बड़ी ग़लती यही है कि तालिबान पर ताक़त के ज़रीया फ़तह हासिल करने की कोशिश की गई जब नाकामी का सामना होने लगा तो मुज़ाकरात का सहारा लिया गया। दहश्तगर्दी के ख़िलाफ़ जंग में अब तक जो कामयाबियां मिली हैं। अगर अफ़्ग़ानिस्तान में अमन क़ायम नहीं हुआ तो ये तमाम कामयाबियां रायगां साबित होंगी। दुनिया भी अमरीका की ताक़तवर फ़ौज के ज़रीया दहश्तगर्दी को कुचलने के ख़ाब को चकनाचूर होता देख ले तो 10 साल से ज़ाइद अर्सा फ़ुज़ूल कोशिशों की नज़र समझा जाय गा। अफ़्ग़ानिस्तान से अमरीका को रुख़स्त होने के लिए एक ऐसी राह की तलाश है जिस में वो ख़ुद को महफ़ूज़ तरीक़ा से निकाल सके मगर अफ़्ग़ानिस्तान के हालिया हालात और तालिबान की कार्यवाईयों ने पूरी दुनिया में उमूमन अमन के लिए जारी कोशिशों पर एक बड़ा सवालिया निशान लगा दिया ही। अफ़्ग़ानिस्तान के अवाम को राहत पहोनचाए बगै़र आलमी ताक़तें अपने बच्चाव की फ़िक्र कररही हैं। तालिबान के साथ मुज़ाकरात के लिए मामूर किए गए हुकूमत के नुमाइंदों की ज़िंदगीयां ख़तरे में हूँ तो फिर मुज़ाकरात का ये अमल किस तरह और कौन पूरा करेगा। अमन बातचीत के लिए जो बुनियादी तक़ाज़ा होता है इस को बालाए ताक़ रख कर सिर्फ यकतरफ़ा कोशिशों का अंजाम बुरहान उद्दीन रब्बानी या हामिद करज़ई के सौतेले भाई की मौत की शक्ल में सामने आए तो इस का मतलब यही है कि अफ़्ग़ानिस्तान के ज़मीनी हक़ायक़ से अमरीका ने अभी सबक़ हासिल नहीं किया है।

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