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बेजा इसराफ़ को ख़त्म करने उल्मा और मशाइख़ीन आगे आएं

निकाह तक़ारीब में इसराफ़ को ख़त्म करने के लिए उल्मा और मशाइख़ीन को आगे आना चाहीए। मौजूदा दौर में मिल्लते इस्लामीया की सब से बड़ी बदक़िस्मती ये है कि मिल्लते इस्लामीया के निकाह तक़ारीब पर ताऐयुश नज़र आ रहे हैं लेकिन मिल्लत मआशी और तालीम

निकाह तक़ारीब में इसराफ़ को ख़त्म करने के लिए उल्मा और मशाइख़ीन को आगे आना चाहीए। मौजूदा दौर में मिल्लते इस्लामीया की सब से बड़ी बदक़िस्मती ये है कि मिल्लते इस्लामीया के निकाह तक़ारीब पर ताऐयुश नज़र आ रहे हैं लेकिन मिल्लत मआशी और तालीमी पसमांदगी का शिकार बनी हुई है।

जनाब ज़ाहिद अली ख़ान ऐडीटर रोज़नामा सियासत ने तहरीक मुस्लिम शबान की जानिब से शुरू कर्दा मुहिम शादी में एक खाना और एक मीठा के मुशावरती इजलास से ख़िताब के दौरान ये बात कही। उन्हों ने कहा कि सुकूत हैदराबाद के वक़्त शहर के मुसलमानों के जो मआशी हालात थे वो यक्सर तबदील हो चुके हैं।

आज मुलाज़मतों में मुसलमानों का फ़ीसद बतदरीज घटता जा रहा है और जो लोग महलात के मकीन हुआ करते थे, फ़्लैट की ज़िंदगी गुज़ारने पर मजबूर हो चुके हैं। उन्हों ने इसराफ़ को एक बदतरीन बीमारी से ताबीर करते हुए कहा कि इसराफ़ के ख़ात्मा के लिए हर महाज़ पर जद्दो जहद करने की ज़रूरत है।

जनाब ज़ाहिद अली ख़ान ने बताया कि फ़िलहाल मुआशरा का मिज़ाज ऐसा बन चुका है कि शादी ख़ाना के पता को देख कर शिरकत करना है या ना करना और किस शादी ख़ाना में तक़रीब है तो वहां किया लवाज़मात होंगे इस का अंदाज़ा लगाकर शिरकत की जा रही है।

उन्हों ने उल्माए जामिआ निज़ामीया से ख़ाहिश की कि वो मिल्लत को इस बुराई से बचाने के लिए जद्दो जहद करें। उन्हों ने औक़ाफ़ी जायदादों के तहफ़्फ़ुज़ के सिलसिला में उर्दू अख़बारात और उन की अपनी काविशों का तज़किरा करते हुए कहा कि क़ौमी यकजहती कौंसिल के इजलास में उन्हों ने वाज़ेह कर दिया कि औक़ाफ़ी जायदादों के तहफ़्फ़ुज़ के ज़रीए ही मुसलमानों की पसमांदगी को दूर किया जा सकता है।

मौलाना तारिक़ कादरी ने बेजा रसूमात, जाहो हश्मत के इज़हार की मुज़म्मत करते हुए निकाह को आसान बनाने की ज़रूरत पर ज़ोर दिया। मौलाना हामिद हुसैन शत्तारी, जनाब रहीम उल्लाह ख़ान नियाज़ी के इलावा दीगर ने भी इस मौक़ा पर ख़िताब किया।

आम आदमी पार्टी क़ाइद जनाब अरशद हुसैन ने कहा कि गेस्ट कंट्रोल ऐक्ट के ज़रीए शादीयों में मेहमानों की तादाद पर हद मुक़र्रर की जा सकती है और पाकिस्तान में ये क़ानून अब भी नाफ़िज़ है।

साबिक़ में हिंदुस्तान की मुख़्तलिफ़ रियास्तों में भी ये क़ानून नाफ़िज़ था। इस तरह के इक़दामात के लिए ज़िम्मेदारान मिल्लते इस्लामीया को आगे आने की ज़रूरत है।

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