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बेटियां पढ़ कर क्या करेंगी

“बेटियां पढ़ कर क्या करेंगी”? ये  कहना है छत्तीसगढ़ के जिला जांजगीर चांपा के गांव सकराली में रहने वाले 45 वर्षीय व्यक्ति का जिनका मानना है कि बेटियों को पढ़ाने लिखाने से क्या फायदा आखिर उन्हे चूल्हा-चौका ही संभालना है। न नौकरी करनी है न जीवन भर पिता के घर बैठना है फिर पढ़ाई  पर खर्च करने का क्या मतलब।

2011 की जनगणना अनुसार सकराली गांव की आबादी 4,549 है इसमें 2289 महिलाएं तथा 2260 पुरष है। लेकिन यहां की बेटियों को शिक्षित होने का अवसर प्राप्त नही हो रहा। कारण क्या है पूछने पर 22 वर्षीय रीना ने बताया “परिवार खेती बाड़ी से चल रहा है। परंतु खेती करने के लिए बारिश के अलावा दूसरा साधन नही है और अक्सर सूखा हो जाने के कारण फसलों का बहुत नुकसान होता है। मुश्किल से घर चल पाता है। पढ़ाई के लिए न समय मिलता है और न पैसा। दिन भर खेत में काम करना पड़ता है ताकि फसल अच्छी हो”।

19 साल की राधिका बताती है “हम चार बहने हैं। मां नही है। बड़ी बहन पढ़ी- लिखी है। बाकी किसी ने पढ़ाई नही की। बाबूजी के खेत में हाथ बंटाते हैं। बहुत मेहनत का काम है, और कभी इतनी मेहनत के बाद भी फसल अच्छी नही हो पाए तो दुख होता है। पढ़ने का मन बहुत करता है लेकिन संभव नही है”।

सरीता कहती है “मैनें 10वीं के बाद पढ़ाई छोड़ दी। खेती से घर चलाना जब मुश्किल हो गया तो पिताजी दूसरे राज्य में काम करने चले गए। और मैं परिवार का ध्यान रखती हूँ, आगे पढ़ना तो सपने जैसा है “।

गोसित राम एंव उनके साथियों ने बताया “गांव की 20 -25 एकड़ जमीन बैराज (बांध) के कारण डुबान क्षेत्र में आ गया है। जिसके कारण लोग खेती नही कर पा रहे। और पलायन करने को मजबूर हैं। ऐसे में लड़कियों को पढ़ाने के बारे में कैसे सोंचे”।

गांव के सरपंच के अनुसार “डभरा ब्लॉक में पहली से बारहवीं तक पाठशालो तो है। मीडिल स्कूल, हाई स्कूल सब है लेकिन शिक्षको की बहुत कमी है। लेकिन जब तक गांव में खेती की स्थिति में सुधार नही होगा लड़कियाँ पढ़ाई से ज्यादा खेती और परिवार चलाने में ही व्यस्त रहेगी तो विद्धालय कहां से आएगी”।

अधिक जानकारी देते हुए साराडीह गांव के भीष्म कुमार चौहान कहते हैं “सिर्फ सकराली गांव ही नही यहां से लगभग 3 किलोमीटर दूर साराडीह गांव में भी शिक्षा का यही हाल है। गांव के नजदीक कोई स्कूल नही है, न ही कोई निजी स्कूल है। सराकारी स्कूल यहां से 10 किलोमीटर दूर डभरा ब्लॉक में स्थित हैं। इतनी दूर जाने के लिए प्रतिदिन का रिक्शा भाड़ा गरीब किसान और मजदूरी करने वाले लोग कहां से अपनी बेटियों को देगें। जिसकी  हमारी बेटियां स्कूल तक पहुंच ही नही पा रही”।

अपने अनुभव साझा करते हुए दिल्ली स्थित चरखा डेवलपमेंट कम्यूनिकेशन नेटवर्क की अंग्रजी की संपादिका सुजाता राघवन बताती हैं “यहां कुछ परिवार ऐसे हैं जो लड़कियों को पढ़ाने में रुची नही रखते, कुछ ऐसे भी हैं जो बेटियों को आगे बढ़ाना चाहते हैं लेकिन संसाधन से वंचित हैं। इसमें कोई शक नही कि केंद्र सरकार से लेकर छत्तीसगढ़ सरकार लड़कियों को शिक्षा से जोड़ने के लिए सरस्वती साईकिल योजना, मुख्यमंत्री प्रोत्साहन राशि योजना, मुफ्त पुस्तक वितरण प्रणाली, पोशाक वितरण प्रणाली जैसी कई योजनाएं चला रही है परंतु योजनाओं का लाभ तब मिलेगा जब लड़कियां भारी संख्या मे स्कूल पहुंच पांएगी। यहां लड़कियां खेती के काम में परिवार का हाथ बंटाती हैं या फिर रोजगार की तलाश में जब पुरुष पलायन कर जाते हैं तो उनकी अनुपस्थिति में खेती करने के साथ साथ परिवार का ध्यान रखती हैं। ऐसे में नियमित रुप से स्कूल जाना संभव नही है”।

स्थिति साफ बता रही है कि सरकार अगर सकराली और साराडीह जैसे गांवों की बेटियों को शिक्षा से जोड़ना चाहती है तो योजनाओं से पहले उन्हे स्कूल तक लाने के लिए किसानों की कृषि पद्धति को मजबूती देनी होगी। ताकि न तो किसान पलायन करें और न ही खेती किसानी में उनका इतना नुकसान हो कि फिर कोईपिता गरीबी के अभाव में बेटी के लिए ये कहे कि “बेटी पढ़ कर क्या करेगी “।

कुमारी अंजली कुर्रे
जांजगीर चांपा (छत्तीसगढ़)
(चरखा फीचर्स)

 

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