बेफिक्र रहिए, गांधी जी की तरह चरखा भी चला लें तो भी उनके जैसे नहीं बन पाएंगे मोदी: रवीश कुमार

बेफिक्र रहिए, गांधी जी की तरह चरखा भी चला लें तो भी उनके जैसे नहीं बन पाएंगे मोदी: रवीश कुमार

खादी ग्रामोद्योग के कैलेंडर में चरख़ा चलाते हुए प्रधानमंत्री मोदी की तस्वीर पर छपी एक भी ख़बर हेडलाइन से आगे नहीं पढ़ी. मुझे पता है कोई गांधी नहीं बन सकता. जो भी गांधी को जानता है, उसे पता होना चाहिए कि यह संभव ही नहीं है. लेकिन कोई प्रयास ही न करे, यह भी कोई दुनिया का अंतिम नियम नहीं है. इसलिए मैं गांधी को लेकर नहीं डरता कि मोदी उनकी मुद्रा में बैठकर चरख़ा चलाएंगे तो गांधी बन जाएंगे और दुनिया गांधी को भूल जाएगी, बल्कि अच्छा लगा कि वे बहुत कुछ होने के साथ साथ गांधी की तरह भी होते हुए दिखना चाहते हैं.

हम जिस देश में रहते हैं वहां बचपन के तीन चार साल तो फैन्सी ड्रेस में गांधी, नेहरू, नेताजी, भगत सिंह, झांसी की रानी बनना ही पड़ता है. अफसोस आज भी कोई बच्चा अंबेडकर बनकर नहीं जाता है. प्रधानमंत्री मोदी का गांधी की मुद्रा में बैठना उसी उत्सवधर्मिता का विस्तार है. प्रधानमंत्री तीन साल के भीतर अनेक मुद्राओं में अनगिनत तस्वीरें देने वाले अकेले राजनेता हैं. इन असंख्य तस्वीरों में वे सिर्फ गांधी नहीं बनते हैं और भी बहुत कुछ बनते दिखते हैं. लोकसभा चुनावों के दौरान उन्होंने कितने तरीके के परिधान पहने. अमृतसर में पगड़ी पहनी तो अरुणाचल का पारंपरिक परिधान पहना.

उनकी मुद्राओं और परिधानों पर अगर किसी स्कूल में फैन्सी ड्रैस प्रतियोगिता हो तो बच्चे कम पड़ जायेंगे. क्या पता बचपन की कोई ग्रंथि हो, स्कूल में कोई चांस मिस हुआ हो, प्रधानमंत्री इस एक तस्वीर के ज़रिये उन सबकी कसर पूरी कर रहे हों. कभी झूला झूलकर तो कभी ड्रम बजा कर इसलिए मोदी के विरोधी नोट कर लें, वे अपने आप में एक स्कूल हैं. जहां वे प्रिंसिपल से लेकर ड्रमर और योगा करते हुए पीटी टीचर की भूमिका ख़ुद अदा करते हैं.

हम सब अलग अलग तरीके से बचपन की इस कमी को पूरा करते हैं. मुझे नहीं मालूम कि प्रधानमंत्री की ऐसी कोई ग्रंथि रही होगी लेकिन जिसके भीतर भी ऐसी ग्रंथि होती है, उसे भी नहीं मालूम होता है. कई बार लोग पहली बार कार ख़रीदते हैं तो उसके दरवाज़े के सामने से घुमा कर ले आते हैं जहां उसने पहली बार कोई नई कार देखी होती है. हम सब फ़िल्में देखकर बालों की स्टाइल बदल देते हैं. अगर कोई यह संकेत दे रहा है कि वह गांधी से प्रभावित है तो उसका स्वागत होना चाहिए.

फैन्सी ड्रैस की आत्मा स्कूल जाने वाले हर भारतीय में रहती है. इस आत्मा की एक खूबी गीता में भी नहीं मिलेगी. फैन्सी ड्रेस अमर है, वो कभी नष्ट नहीं होती. इसे पहनने वाला नश्वर है, हर साल बदलता रहता है. फैन्सी ड्रैस में प्रवेश करने वाली आत्माओं के बैच हर साल बदल जाते हैं. इसी तरह हम सभी को बचपन से ही किसी दूसरे की तरह दिखकर उनके साथ छल करना सीखाया जाता है. दिखावे और छलावे के राष्ट्रीय चरित्र की बुनियाद स्कूलों में पड़ती है. भारत के असंख्य स्कूलों ने फैन्सी ड्रेस के ज़रिये करोड़ों बच्चों को इसका अभ्यास कराया है. फैन्सी ड्रैस प्रतियोगिता में एक ही लड़का अलग अलग साल में अलग अलग महापुरुष बनता है. मुमकिन है कि ऐसे करोड़ों छात्र इन महापुरुषों पर एक भी किताब न पढ़ते हों, इनके विचारों से उलट काम करते हों.

उन्हीं स्कूलों से पढ़े लिखे ‘अल्लबल्ल लिबरल’ ने क्या नहीं देखा होगा कि भारत में प्रतीक पुरुषों को किस तरह विज़ुअल फॉर्म में याद किया जाता है. हम इन विज़ुअल फॉर्म के ज़रिये साफ कर देते हैं कि देखो भाई, विचार- वचार हमसे न हो पाएगा. मूर्ति बना दो, ऊंची मूर्ति बना दो, हम माला-वाला पहनाकर वहां तक निभा देंगे. देश के हर नुक्कड़ पर खड़ी किसी महापुरुष या महास्त्री की प्रतिमा उसी फैन्सी ड्रेस का विस्तार है. इसका मतलब है कि यह शख्स हमारे लिए पत्थर से ज़्यादा कोई मायने नहीं रखता. हमारे लिए यह मील का पत्थर बन चुका है. गांधी मूर्ति से बायें मुड़ जाना और नेहरू चौक पहुंच कर दायें, वहां से सीधे चलना. भगत सिंह और नेताजी की मूर्तियों वाले दो चौराहे के बाद इंकम टैक्स का दफ्तर आ जाएगा. ये मूर्तियां पता बताने का सबसे विश्वसनीय ज़रिया है.

जो लोग अभी तक इस भुलावे में हैं कि किसी को याद करने का मतलब उनके विचारों को समझना और अपने जीवन में उतारना है, ऐसे ही दस पांच लोगों को चिढ़ाने के लिए हज़ारों करोड़ो की ऊंची ऊंची मूर्तियां बन रही हैं. अगर ये दस पांच लोग विचारों पर चलने का आग्रह छोड़ दिये होते तो इनके चिढ़ाने के नाम पर जनता का इतना पैसा बर्बाद न होता. आज कल इमारतें ऊंची हो गई हैं इसलिए चौराहे पर लगी छोटी मूर्तियां नहीं दिखतीं. ऊंची इमारतों के जंगल से होड़ करने के लिए नेता चाहते हैं कि मूर्तियां ऊंची हों ताकि सबको पता चल जाए कि ऊंची मूर्ति वाले महापुरुष पाषाण युग को समर्पित कर दिये गए हैं. इनका सम्मान कर आगे चला जाए क्योंकि अगली जयंती पर कोई और मूर्ति इंतज़ार कर रही है.

कितने ही लड़के गांधी बनकर मोहल्ले से निकलते हुए स्कूल जाते हैं. कितनी ही लड़कियां झाँसी की रानी बनकर स्कूल जाती हैं. समाज को कोई फर्क नहीं पड़ता कि ये स्कूल से लौट कर गांधी ही बन जायेंगे. अगर इनमें से एक ने भी गांधी बनने का प्रयास किया तो गांधी का नाम लेने वाला वही समाज उसकी हत्या कर देगा. उसे तरह तरह के तानों से मार देगा क्योंकि उसका प्रशिक्षण सिर्फ गांधी या नेहरू की तरह दिखने के लिए हुआ है, न कि जिसकी तरह दिखते हैं उसकी तरह हो जाने के लिए. मोदी से आग्रह क्योंकि उनमें गांधी का कौन सा विचार है, क्या कांग्रेस के नेताओं में गांधी का लक्षण दिखता है?

खादी ग्रामोद्योग के किसी कैलेंडर में गांधी की मुद्रा में प्रधानमंत्री की यह तस्वीर बहुत कुछ कह रही है. कोई उन तस्वीरों में प्रायश्चित भी देख सकता था. कोई उन तस्वीरों में उस राजनीति की हार देख सकता था जो गांधी को खलनायक मानती है. मोदी निःसंदेह भारत की राजनीति के सबसे बड़े नायक हैं, फिर भी कई साल पहले जनवरी के महीने में मार दिये गए और खलनायक की तरह दिखाये जाने वाले गांधी की तरह दिखना चाहते हैं. इसका स्वागत होना ही चाहिए. इस एक तस्वीर से गांधी के प्रति ज़हर उगलने वालों के दिल पर क्या बीतेगी, मैं नहीं जानता. यही कि अस्सी नब्बे साल लगाकर गांधी को ज़हर बताया जाता रहा लेकिन अंत में गांधी बनने और उनकी तरह दिखने में ही मुक्ति मिली. यही राजनीति कराती है. आपको अच्छे के लिए भी बदलती है. बुरे के लिए भी बदलती है.

मुझे इस तस्वीर में प्रधानमंत्री नीलकंठ की तरह प्रतीत होते हैं. उन्होंने चरखा चलाते हुए गांधी के ख़िलाफ़ उगला गया सारा ज़हर पी लिया है. मुझे नहीं मालूम गांधी के ख़िलाफ़ ज़हर उगलने वालों की प्यास अब कैसे बुझेगी. मेरी नज़र में यह तस्वीर ऐतिहासिक है. जिस वैचारिक धारा के संगठन से प्रधानमंत्री आते हैं, वहां गांधी की तरह बनने या दिखने का कहां मौका मिला होगा. लेकिन यह हो नहीं सकता कि उन्होंने गांधी बनकर स्कूल जाते बच्चों को न देखा होगा. उनके विरोधी इस तस्वीर का विरोध कर प्रधानमंत्री और गांधी के साथ अन्याय कर रहे हैं. हो यह रहा है कि सब ख़ुद को किसी खांचे से बाहर नहीं आने देना चाहते. विचारों के बंद कमरे में फूल नहीं खिला करते हैं और प्लास्टिक के फूलों से ख़ुश्बू नहीं आती है. गांधी तो शत्रु से भी मित्रता की बात करते थे.

कैलेंडर क्या चीज़ है, पूरा मंत्रालय और ग्रामोद्योग प्रधानमंत्री के अधीन है. क्या हम ये भी उम्मीद करें कि प्रधानमंत्री इस विभाग का त्याग कर दें? विरोधियों को एक पल के लिए सोचना चाहिए. इस देश में गांधी के पास जाने का हक सबको है. गांधी उनके भी हैं जो गांधी के नहीं हैं, तभी तो वे सबके बापू हैं. इस तरह के विवाद फालतू हैं. लेकिन व्यक्तिगत विरोध मोदी के लिए फालतू नहीं होता. वे हमेशा चाहते भी हैं कि विरोध व्यक्तिगत हो – मोदी का हो. नीतियों और राजनीति का न हो. विरोधी प्रधानमंत्री मोदी की इस मांग को पूरा कर रहे हैं. प्रधानमंत्री जब आपातकाल के लिए इंदिरा गांधी की आलोचना करते हैं और उनके ही मशहूर स्लोगन को अपना भी लेते हैं तो चरख़ा चलाते हुए पोज़ क्यों नहीं दे सकते. गांधी का इस्तेमाल सबने किया है. प्रधानमंत्री मोदी भी कर सकते हैं. इससे गांधी को कोई फर्क नहीं पड़ता है.

साभार- NDTV

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