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बेवक़त सोना सेहत के लिए खराबी

बाअज़ लोग सोने के इतने ज़्यादा शौक़ीन होते हैं कि जहां चाहे उन्हें नींद आजाती है जैसा कि कहा जाता है कि आदमी को सूली पर भी नींद आजाती है लेकिन यूनीवर्सिटी आफ़ कैलीफोर्निया के माहिरीन का कहना है कि बेवक़त का सोना सेहत के लिए अच्छा नहीं ह

बाअज़ लोग सोने के इतने ज़्यादा शौक़ीन होते हैं कि जहां चाहे उन्हें नींद आजाती है जैसा कि कहा जाता है कि आदमी को सूली पर भी नींद आजाती है लेकिन यूनीवर्सिटी आफ़ कैलीफोर्निया के माहिरीन का कहना है कि बेवक़त का सोना सेहत के लिए अच्छा नहीं है।

इस्लामी नुक़्ता-ए-नज़र से भी रात आराम करने के लिए बनाई गई है जहां इंसान सोते हुए अपने जिस्म को आराम दे और सुबह में ताज़ा दम होकर एक बार फिर मेहनत-ओ-मशक़्क़त के लिए तैयार होजाए लेकिन भला हो मुख़्तलिफ़ आराम‌ वाली तर्ज़-ए-ज़िदंगी का जो इंसान को आरामपसंद बनादेती है जिस में जिस वक़्त चाहा ख़ाब-ए-ग़फ़लत के खर्राटे लेना भी शामिल है।

माहिर सेहत ख़लील उद्दीन गॉड फिरे का कहना है कि नींद का मज़ा उस वक़्त लिया जा सकता है जब हमें वाक़ातन सोने की बहुत ज़्यादा ज़रूरत महसूस होरही है। ये नहीं कि सुबह उठे, नाश्ता किया और फिर सोने चले गए। दोपहर हुई, खाना नोश किया और दुबारा सोने चले गए। शाम को आँख खुली तो चाय की तलब महसूस हुई। चाय पी कर कहने लगे कि यार बहुत सुस्ती महसूस होरही है।

एक आध घंटे की नींद ले लेता हूँ। इस तरह दिन भर नींदर में गुज़र जाता है और इंसान आरामपसंद होजाता है। जिस्म का कोई उज़ू जब मसरूफ़ ही नहीं होता तो इंसान फ़र्बिही का शिकार होजाता है और कोई भी काम करने में चुसती का मुज़ाहरा नहीं करता बल्कि आहिस्ता आहिस्ता काहिल होजाता है।

गॉड फिरे ने कहा कि काहिली की वजह से इंसान के जिस्म की क़ुव्वत-ए-मदाफ़अत भी कमज़ोर होजाती है जिस से मुख़्तलिफ़ बीमारियां हावी होने का अंदेशा बरक़रार रहता है। लिहाज़ा जिस तरह वक़्त पर खाने की तलक़ीन की जाती है बिलकुल उसी तरह सोने के लिए भी वक़्त की पाबंदी करना चाहिए।

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