Wednesday , December 13 2017

बेशक तुम्हारा मुझ पर दुरूद भेजना तुम्हारी ज़कात है

बेशक तुम्हारा क़ाबिल एहतिराम क़ारईन : ख़ालिक़े कायनात , मालिके कुल अल्लासुब्हाना व तआला ने हम सब को इस दुनियाए फ़ानी में बज़रीया मुस्तफ़ा स०अ०व० को भेजा है ।यक़ीनन ये एक एसी बेहतरीन अता है कि जिस पर जितना शुक्र बजा लाएंगे उतना ही कम है। ये

बेशक तुम्हारा क़ाबिल एहतिराम क़ारईन : ख़ालिक़े कायनात , मालिके कुल अल्लासुब्हाना व तआला ने हम सब को इस दुनियाए फ़ानी में बज़रीया मुस्तफ़ा स०अ०व० को भेजा है ।यक़ीनन ये एक एसी बेहतरीन अता है कि जिस पर जितना शुक्र बजा लाएंगे उतना ही कम है। ये इसलिए कहा जा रहा है कि आज के इस तरक़्क़ी याफ़ता दौर में कई ऐसी चीज़ें नमूदार हो रही हेंका जिस के देखने के बाद ये समझ में आ रहा है कि इन तमाम को पैदा करने वाला सिर्फ़ और सिर्फ़ अल्लाह सुब्हाना व तआला ही है। जो यकता-ओ-तन्हा है कोई उसका शरीक-ओ-साझी नहीं है ।

बतलाना ये मक़सूद है कि जब मौलाए हक़ीक़ी सब को पैदा किया है तो हम फ़क़त उसी का हुक्म मानें लेकिन ऐसा नहीं हुआ बल्कि ख़ालिके हक़ीक़ी ने तो हुज़ूर (स०अ०व०) की पैरवी का हमें हुक्म दिया आख़िर वजह किया है ? उस की वजह यही बतलाई गई है कि ज़रा ग़ौर व फिक्र तो करें कि अगर हमें अपनी मंज़िल-ए-मक़सूद तक पहुंचना है तो उस वक़्त तक हम अपनी मंज़िल-ए-मक़सूद को हरगिज़ नहीं पहुंच सकते जब तक कि पहुंचने का ज़रीया ना अपनाया जाये। बिला तशबीया-ओ-तमसील हम सब बंदों को अल्ला सुब्हाना व तआला का क़ुर्ब पाने के लिए बेहद ज़रूरी है कि ज़रीया यानी मुहम्मद मुस्तफ़ा (स०अ०व०) की पैरवी की जाये और आप (स०अ०व०) का उस्वा अपनाया जाये।

अब हमारी इतनी रसाई तो नहीं है कि आसानी से दर-ए-मुस्तफ़ा (स०अ०व०) पर पहुंच जाएं अलबत्ता इसके लिए तरीका ये बतलाया गया है कि सहाबा रिज़वानुल्लाहि तआला अलैहिम अजमईन के नक़्श एकदम पर चलें और उन से मुहब्बत रखें साथ ही साथ अहलेबैत अतहार से सच्ची और पक्की वाबस्तगी को क़ायम-ओ-दाइम रखें और ये बात भी ज़हन में रखें कि जब तक हम अपने अंदर मुहब्बत रसूल का सहीह जज़बा नहीं रखेंगे तब तक हमें कामयाबी और सरफ़राज़ी हासिल नहीं होगी ।

एक मर्द अमूमन अगर वो अपने अमान में तकमिला चाहता है तो लाज़िम है कि वो हुज़ूर नबी करीम (स०अ०व०) से बे इंतिहा मुहब्बत रखे और दरूद शरीफ़ का कसरत से विर्द करते रहे। क्योंइकि दरूद शरीफ़ आक़ा (स०अ०व०) दो जहां (स०अ०व०) पर पढ़ना गोया ज़कात अदा करना है अब ये ज़कात कैसे होगी ? तो इसके मुताल्लिक़ आज कुछ इसी अहादीस शरीफा तहरीर की जाएगी कि जिस से पता चलेगा कि वाक़ई दरूद शरीफ़ इंतिहाई अहमियत के हामिल है और इसी दरूद शरीफ़ के ज़रीया एक मर्द अमूमन दरे मुस्तफा (स०अ०व०) तक रसाई हासिल कर सकता है और दारेन में बेहतर मुक़ाम का हक़दार बन सकता है। अहादीस मुलाहिज़ा हो:

* हज़रत सैय्यदना अब्बू हुरैरा रज़ी० से रिवायत है कि हुज़ूर नबी करीम (स०अ०व०) ने इरशाद फ़रमाया मुझ पर दुरूद भेजा करो बेशक तुम्हारा मुझ पर दुरूद भेजना ये तुम्हारी ज़कात है और अल्लाह तआला से मेरे लिए वसीला तलब करो पस सहाबा किराम रिज़वानुल्लाह तआला अलैहिम अजमईन ने आप (स०अ०व०) से सवाल किया कि या रसूलुल्लाह (स०अ०व०) ये वसीला क्या है ? आप (स०अ०व०) ने फ़रमाया : बेशक वसीला जन्नत में एक आला दर्जे का नाम है और उस को सिर्फ़ एक आदमी हासिल कर पाएगा और में उम्मीद करता हूँ कि वो आदमी मैं ही होंउगा। इब्ने अबी शिबा:

* हज़रत सैय्यदना अबू हरैरह रज़ी० से रिवायत है कि हज़रत नबी करीम (स०अ०व०) ने फ़रमाया मुझ पर दुरूद शरीफ़ भेजा करो बेशक तुम्हारा मुझ पर दुरूद शरीफ़ भेजना तुम्हारे लिए ज़कात है। इब्ने अबी शिबा:

* हज़रत अबू सईद रज़ी० रिवायत करते हैं कि हुज़ूर नबी करीम (स०अ०व०) ने इरशाद फ़रमाया है कि जिस किसी मुसलमान के पास सदक़ा ना हो तो वो अपनी दुआ में ये कहे कि ऐ मेरे अल्लाह तू अपने बंदे और रसूल हज़रत मुहम्मद मुस्तफा (स०अ०व०) पर दरूद भेज और मोमिन मर्दों और मोमिन औरतों और मुसलमान मर्दों और मुसलमान औरतों पर दरूद भेज पस इसका ये दरूद उसकी ज़कात होगी। इब्ने हब्बान

* हज़रत सैय्यदना फ़ातिमा बिंते रसूलुल्लाह (स०अ०व०) से रिवायत है कि जब भी हुज़ूर नबी करीम (स०अ०व०) मस्जिद में दाख़िल होते तो फ़रमाते अल्लाह तआला के नाम और रसूलुल्लाह (स०अ०व०) पर सलाम के साथ आए ऐ अल्लाह मेरे लिए अपनी रहमत के दरवाज़े खोल दे और जब मस्जिद से बाहर तशरीफ़ लाते तो फ़रमाते अल्लाह तआला के नाम के साथ और हुज़ूर नबी करीम (स०अ०व०) पर सलाम के साथ । आए अल्लाह मेरे गुनाहों को माफ़ फ़र्मा और मेरे लिए अपने फ़ज़ल के दरवाज़े खोल दे। ‍‍‍‍ इब्नेन माजा

* हज़रत सैय्यदना फ़ातिमा रज़ी० से रिवायत है कि रसूलुल्लाह (स०अ०व०) जब मस्जिद में दाख़िल होते तो फ़रमाते ऐ अल्लाह तू मुहम्मद (स०अ०व०) और आप (स०अ०व०) की ऑल पर दुरूद भेज फिर फ़रमाते ऐ अल्लाह मेरे गुनाह माफ़ फ़र्मा और मेरे लिए रहमत के दरवाज़े खोल दे और जब मस्जिद से बाहर तशरीफ़ लाते तो फ़रमाते आए अल्लाह तू हज़रत मुहम्मद (स०अ०व०) पर दुरूद भेज फिर फ़रमाते ऐ अल्लाह मेरे गुनाह बख़्श दे और मेरे लिए अपने फ़ज़ल के दरवाज़े खोल दे | अहमद बिन हंबल रह०

* हज़रत इब्ने उमर और हज़रत अब्बू हुरैरा रज़ी० रिवायत करते हैं कि रसूलुल्लाह(स०अ०व०) ने इरशाद फ़रमाया मुझ पर दुरूद भेजा करो अल्लाह तआला तुम पर दुरूद (बसूरत रहमत) भेजेगा।

* हज़रत अबदुल्लाह बिन उमरो बिन आस रज़ी० रिवायत करते हैं कि जो शख्स हुज़ूर नबी करीम (स०अ०व०) पर एक मर्तबा दुरूद भेजता है अल्लाह तआला और इसके फ़रिश्ते इस पर सत्तर मर्तबा दरूद भेजते हैं पस अब बंदा को इख्तेयार है चाहे वो आप (स०अ०व०) पर कम दरूद भेजे यह ज़्यादा। अहमद बिन हंबल

खुलासा मज़मून यही है कि हर हाल में बंदा एक उम्मते मुस्तफा (स०अ०व०) होने के नाते कसरत से दुरूद शरीफ़ का विर्द करते रहें ताकि ये दुरूद ज़कात बन जाये और हमें बड़ी इज़्ज़त और फ़ख़र के साथ जीने का भरपूर मौक़ा फ़राहम हो जाए। अल्ला तआला से दुआ है कि वो हम तमाम को बेहद-ओ-बेहिसाब दुरूद शरीफ़ का विर्द करने की तौफ़ीक़ अता फ़रमाए । आमीन….

TOPPOPULARRECENT