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भारत के सार्वजनिक बैंक कर्ज से परेशान, रिजर्व बैंक की ताकत बढ़ानी होगी : अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष

अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने गुरुवार को कहा कि भारत फिलहाल सार्वजनिक बैंकों के कर्ज से परेशान है.भारत के उभरते बाजार में देश के बैंक भारी कर्ज के बोझ से दबे हैं. वापस ना होने वाले कर्ज यानी बैड डेट का सबसे बड़ा हिस्सा सार्वजनिक बैंकों का ही है. कर्ज का यह बोझ इतना बड़ा है कि बैंकों के पास नए निवेश के लिए कर्ज देना संभव नहीं रह गया है. भारतीय अर्थव्यवस्था में इसका असर विकास पर पड़ रहा है.

अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने भारत के वित्तीय तंत्र की स्थिरता पर अपनी सालाना रिपोर्ट में कहा है कि ये परिस्थितियां बैंकों के लचीलेपन का इम्तिहान ले रही हैं. आईएमएफ ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि कर्ज देने वाले बड़े संस्थान सुदृढ़ हैं, “लेकिन तंत्र की अपनी कई बड़ी कमजोरियां हैं.” आईएमफ ने इसके साथ ही यह भी कहा है कि सार्वजनिक बैंकों का समूह परिसंपत्तियों के लिहाज से और ज्यादा नीचे जाने का खतरा झेल रहा है.

आईएमएफ के मुताबिक पर्याप्त सुधारों के बाद भी वित्तीय क्षेत्र में बेहतरी की गुंजाइश है और इसमें रिजर्व बैंक की स्वतंत्रता भी शामिल है. आईएमएफ की रिपोर्ट में कहा गया है, “इसमें आरबीआई की स्वतंत्रता के साथ साथ सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के मामले में इसकी ताकत बढ़ाना भी खास तौर पर जरूरी है. साथ ही वित्तीय नियंत्रक के संसाधनों को बढ़ाना भी.”

सरकार लगातार रिजर्व बैंक से ब्याज की दरों में कटौती के लिए कहती रही है ताकि निवेश को बढ़ावा दिया जा सके. बैंक अभी तक ऐसा करने से बचते रहे हैं, उन्हें डर है कि पहले से ही सात साल के निचले स्तर पर चल रही ब्याज दर को और घटाने से महंगाई बढ़ सकती है.

भारत में कर्ज की समस्या उस वक्त सुर्खियों में आई जब पिछले साल शराब और एयरलाइन कारोबारी विजय माल्या ब्रिटेन भाग गए. उन पर भारत के बैंकों का एक अरब डॉलर का कर्ज है. मई में सरकार ने सेंट्रल बैंक को बैड डैट के मामले में दखल देने का अधिकार दिया. इसके साथ ही बैंकों को कर्ज के मामले से निपटने के लिए दिवालिया घोषित करने वाले कानूनों की मदद लेने को कहा.

अक्टूबर में भारत सरकार ने सरकारी बैंकों के लिए 32 अरब डॉलर की रिकैपिटलाइजेशन योजना का एलान किया जिसका मकसद बैंकों के खाते क्लियर करना और निवेश को बढ़ाना था क्योंकि भारत के अर्थव्यवस्था की रफ्तार धीमी पड़ गयी थी.

अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने इन कदमों का स्वागत किया है लेकिन इसके साथ ही यह भी कहा है कि भारत को सार्वजनिक बैंकों के प्रशासन को बेहतर करना होगा.

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