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दुनिया के कुल कुपोषित बच्चों में 40 फीसद भारतीय : रिपोर्ट

दिल्ली : भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में से है लेकिन यहां कुपोषित बच्चों की तादाद शर्मनाक रूप से बढ़ रही है. दुनिया के कुल कुपोषित बच्चों में 40 फीसदी भारतीय हैं. यह संख्या अफ्रीका से भी ज्यादा है. यूनिसेफ की रिपोर्ट है कि देश के साढ़े पांच करोड़ बच्चे यानी पांच साल से कम उम्र के लगभग आधे भारतीय बच्चे कुपोषित हैं. पालघर के ज्यादातर बाशिंदे गरीबी हैं और पंडित बताते हैं कि ये लोग समाज कल्याण की सरकारी योजनाओं पर ही निर्भर हैं. इनमें स्वास्थ्य और दूसरी कई तरह की सेवाएं हैं. जिले में मेडिकल सुविधाएं बहुत कम हैं और पहुंच से लगभग बाहर हैं.

अगर पूरी दुनिया की बात करें तो हालात पहले से कुछ अच्छे हुए हैं. 2014 में दुनिया भर में साढ़े अस्सी करोड़ ऐसे लोग हैं जिनके पास पर्याप्त खाना नहीं है. वहीं करीब दो अरब लोग कुपोषित हैं. पांच साल से कम उम्र में बच्चों की मृत्यु, उनमें कुपोषण और कुल जनसंख्या में कुपोषण की संख्या को आंका जाता है और उसका विश्लेषण किया जाता है. एक महत्वपूर्ण बात यह भी है कि केवल पेट भरना पोषण नहीं है. अक्सर माता पिता को यह पता ही नहीं होता कि उनके बच्चे कुपोषण का शिकार हैं. अंधविश्वास के कारण वह इसे श्राप मानते रहते हैं और डॉक्टर की बजाए नीम हकीम से काम चलाते हैं. कुपोषण के मामले में देश में मध्यप्रदेश की स्थिति बहुत खराब है. कुपोषित बच्चों के लिए खास केंद्र बनाए गए हैं, जहां मां और बच्चों को समुचित आहार दिया जाता है. खरगोन में जन साहस नाम के गैर सरकारी संगठन के लिए काम करने वाली जासमीन खान बताती हैं कि अक्सर डॉक्टर इलाज के लिए मौजूद नहीं होते और मुश्किल में पड़े लोगों को मदद मिलने में देर हो जाती है. गरीबी के कारण खेतों में दिहाड़ी मजदूरी करने वाली महिलाएं परेशानी में आ जाती हैं. वे जानती हैं कि उनका बच्चा बीमार है लेकिन अक्सर परिजन ही उन्हें सहायता केंद्र जाने से रोक देते हैं.

नरेंद्र मोदी सरकार के आने के बाद से भारत की समाज कल्याण योजनाओं के फंड में काफी कटौती की गई है. लाखों बच्चों को खाना, साफ पानी और शिक्षा मुहैया कराने वाली इन योजनाओं के मद में कटौती करके सरकार सड़क, बंदरगाह और पुल बनाने पर खर्च बढ़ा रही है. लेकिन इन सड़कों का इस्तेमाल करने लायक होने से पहले ही बच्चे जान से जा रहे हैं. मानवाधिकार आयोग ने पालघर में बच्चों की मौत को मानवाधिकारों का उल्लंघन माना है. पंडित कहते हैं, “हमें नौकरियां उपलब्ध करानी हैं, गरीबी को भी दूर करना है लेकिन यह भी तो सुनिश्चित करना है कि बच्चों को खाना मिले. हमारे पास संसाधन तो हैं लेकिन इन बच्चों के लिए सहानुभूति नहीं है इसलिए कोई कुछ नहीं करता.”

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