मक़बूल उर्दू कलमकार शहरयार का इंतिक़ाल

मक़बूल उर्दू कलमकार शहरयार का इंतिक़ाल
अदबी हलक़ों में ये ख़बर इंतिहाई अफ़सोस के साथ पढ़ी जाएगी कि उर्दू के मशहूर शायर और ग्यान पीठ एवार्ड याफ़ता जनाब अख़लाक़ मुहम्मद ख़ां उल-मारूफ़ शहरयार का आज रात 8 बजे अपनी क़ियामगाह पर इंतिक़ाल हो गया । शहरयार कुछ अर्सा से कैंसर के मर्ज़ में

अदबी हलक़ों में ये ख़बर इंतिहाई अफ़सोस के साथ पढ़ी जाएगी कि उर्दू के मशहूर शायर और ग्यान पीठ एवार्ड याफ़ता जनाब अख़लाक़ मुहम्मद ख़ां उल-मारूफ़ शहरयार का आज रात 8 बजे अपनी क़ियामगाह पर इंतिक़ाल हो गया । शहरयार कुछ अर्सा से कैंसर के मर्ज़ में मुबतला थे ।

जून 1936 में उत्तर प्रदेश के ज़िला बरेली के आंवला क़स्बे में पैदा हुए कंवर अख़लाक़ मुहम्मद ख़ां शहरयार की तालीम-ओ-तरबियत अलीगढ़ में हुई और यहीं 1966 में शोबा उर्दू में लेक्चरर की हैसियत से उन का तक़र्रुर हुआ था । उनकी शायरी का सिलसिला इसी दहाई के आस पास शुरू हुआ । शहरयार का पहला मजमूआ कलाम इस्म-ए-आज़म के उनवान से मंत्र आम पर आया था ।

उन के दूसरे मजमा कलाम ख़ाब का दर बंद है को साहित्य एकेडमी इनाम से नवाज़ा गया था । इसके बाद उन के मजमूआ कलाम सातवां दर ने शोहरत हासिल की थी । शहरयार को अवामी शोहरत मुज़फ़्फ़र अली की फ़िल्म से हासिल हुई जिसमें इन की दर्ज ज़ैल ग़ज़ल काफ़ी मशहूर हुई थी ।

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