Tuesday , May 22 2018

मनचंदा बानी की ग़ज़ल: “मेरे बदन में पिघलता हुआ सा कुछ तो है”

मेरे बदन में पिघलता हुआ सा कुछ तो है
इक और ज़ात में ढलता हुआ सा कुछ तो है

मिरी सदा न सही, हाँ मेरा लहू न सही
ये मौज-मौज उछलता हुआ सा कुछ तो है

कहीं न आख़िरी झोंका हो मिटते रिश्तों का
ये दरमियाँ से निकलता हुआ सा कुछ तो है

जो मेरे वास्ते कल ज़हर बन के निकलेगा
तेरे लबों पे संभलता हुआ सा कुछ तो है

बदन को तोड़ के बाहर निकलना चाहता है
ये कुछ तो है, ये मचलता हुआ सा कुछ तो है

ये मैं नहीं, न सही, अपने सर्द बिस्तर पर
ये करवटॆं सी बदलता हुआ सा कुछ तो है

मेरे वजूद से जो कट रहा है गाम-ब-गाम
ये अपनी राह बदलता हुआ सा कुछ तो है

जो चाटता चला जाता है मुझको ऐ ‘बानी’
ये आस्तीन में पलता हुआ सा कुछ तो है

(राजिंदर मनचंदा बानी)

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