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मन्ना डे नहीं रहे

'ज़िंदगी कैसी है पहेली हाय' ऩगमे को अपनी आवाज़ देने वाहे मशहूर गुलूकार मन्ना डे नहीं रहे। वो 94 साल के थे। जुमेरात की सुबह साढ़े 4 बजे आखिरी उन्होंने आखरी सांस ली। वो काफी दिनों से बीमार थे। प्ले बैक सिंगर मन्ना डे को बैंगलोर के एक अ

‘ज़िंदगी कैसी है पहेली हाय’ ऩगमे को अपनी आवाज़ देने वाहे मशहूर गुलूकार मन्ना डे नहीं रहे। वो 94 साल के थे। जुमेरात की सुबह साढ़े 4 बजे आखिरी उन्होंने आखरी सांस ली। वो काफी दिनों से बीमार थे। प्ले बैक सिंगर मन्ना डे को बैंगलोर के एक अस्पताल में भर्ती कराया गया था।
मन्ना डे बेटी शुमिता देव और उनके दामाद ज्ञानरंजन देव अस्पताल में मौजूद थे। मन्ना डे की दो बेटियां हैं अमेरिका में रहती है। उनके दामाद ने बताया उनके आखरी रूसूमात आज दिन में किये जाएंगे।

1 मई 1919 को कोलकाता के एक बंगाली खानदान में पैदा हुए मन्ना डे ने अपने करियर में 4000 से ज्यादा नग़मे गाये। 1942 में फिल्म तमन्ना से उन्होंने अपने करियर की शुरुआत की थी। इस फिल्म में उन्होंने सुरैया के साथ गाना गाया था। उन्हें 1971 में पद्मश्री और 2005 में पद्म विभूषण और 2007 में दादा साहब फाल्के अवार्ड से नवाज़ा गया। उन्होंने हिंदी, बंगाली, मराठी, गुजराती, मलयालम, कन्नड और असमिया में भी गाने गाये। मन्ना डे का असली नाम प्रबोध चंद्र डे है।
फिल्म काबुलीवाला का ‘ऐ मेरे प्यारे वतन’ और आनंद का ‘ज़िंदगी कैसी है पहेली हाय’ आज भी शाएक़ीन के दिल को छू जाता है। ‘पूछो न कैसे मैंने रैन बिताई’, ‘लागा चुनरी में दाग़’, ‘कौन आया मेरे मन के द्वारे’, ‘ऐ मेरी जोहर-ए-जबीं’, ‘ये रात भीगी-भीगी’, ‘ठहर जरा ओ जाने वाले’, ‘बाबू समझो इशारे’, ‘कसमे वादे प्यार वफा सब बातें हैं… जैसे ऩगमे आज भी फिज़ा में गूंजते रहते हैे।

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