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मसला-ए-कश्मीर का सब के लिए काबिल‍ ए‍ कुबूल हल नामुमकिन

वज़ीर-ए-ख़ारजा पाकिस्तान ख़ुरशीद महमूद क़सूरी ने जो अब पाकिस्तान की तहिरीक-ए-इंसाफ़ की तशकील दी हुई कश्मीर टास्क फ़ोर्स के सरबराह हैं आज कहा कि मसला-ए-कश्मीर का एक बिलकुल मुकम्मल हल जो सबके लिए काबिल‍ ए‍ कुबूल हो नामुमकिन है।

वज़ीर-ए-ख़ारजा पाकिस्तान ख़ुरशीद महमूद क़सूरी ने जो अब पाकिस्तान की तहिरीक-ए-इंसाफ़ की तशकील दी हुई कश्मीर टास्क फ़ोर्स के सरबराह हैं आज कहा कि मसला-ए-कश्मीर का एक बिलकुल मुकम्मल हल जो सबके लिए काबिल‍ ए‍ कुबूल हो नामुमकिन है।

उन्होंने कहा कि ऐसा कोई हल जो तमाम कश्मीरी अवाम के लिए जो हिंदूस्तान और पाकिस्तान में मुक़ीम हैं काबिल‍ ए‍ कुबूल हल तलाश नहीं किया जा सकता। उन्होंने कहा कि साबिक़ सदर-ए-पाकिस्तान परवेज़ मुशर्रफ़ और इस दौर के वज़ीर-ए-आज़म हिंदूस्तान अटल बिहारी वाजपाई ने मसला-ए-कश्मीर की यकसूई की सिम्त काफ़ी पेशरफ़त की थी लेकिन वो ऐसा कोई हल दरयाफ्त नहीं कर सके।

सिर्फ ब्यानात से मसला-ए-कश्मीर की यकसूई नामुमकिन है और ना साईंसदाँ मसला हल कर सकते हैं। साईंसदाँ हमेशा आइन्दा इंतेख़ाबात की फ़िक्र में रहते हैं। उन्होंने कहा कि हिंदूस्तान और पाकिस्तान के दरमयान आइन्दा किसी जंग का इम्कान नहीं है।

हम सिर्फ अपने मौक़िफ़ में तब्दीली करते हुए ग़लत फ़हमियों का अज़ाला और एक दूसरे के साथ शफ़्फ़ाफ़ रवाबित क़ायम करते हुए इस सिलसिला में पेशरफ़त कर सकते हैं। मसला-ए-कश्मीर की यकसूई का यही वाहिद रास्ता है। वो 2002 से 2007 तक पाकिस्तान के वज़ीर-ए-ख़ारजा रह चुके हैं और अब क्रिकेट खिलाड़ी से सियासतदां बनने वाले इमरान ख़ान की तहिरीक-ए-इंसाफ़ पार्टी में शामिल हो चुके और तनाज़ा कश्मीर की यकसूई के लिए इस पार्टी की टास्क फ़ोर्स के सरबराह हैं।

उन्होंने अवाम से अवाम के रवाबित के किरदार पर ज़ोर देते हुए कहा कि दोनों ममालिक में ताक़तवर और बा रसूख पैरोकार मौजूद हैं जो दोनों ममालिक के दरमयान इख्तेलाफ़ात बरक़रार रखना चाहते हैं। हिंदूस्तान और पाकिस्तान के दरमयान हालिया मीज़ाईल की मुसाबक़त के बारे में सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि बाअज़ औक़ात दो भाईयों में भी लड़ाई हो जाती है।

लेकिन ज़िंदगी रुकती नहीं जारी रहती है। दोनों ममालिक के दरमयान मुसाबक़त आइन्दा कम होने का भी इम्कान है। उन्होंने दोनों ममालिक की क़ियादत पर ज़ोर दिया कि वो कोई भी फ़ैसला करते वक़्त अवाम की राय को पेशे नज़र रखें।

क़सूरी ने याददेहानी की कि महात्मा गांधी और मुहम्मद अली जिन्ना दोनों का दोस्ताना हिंद। पाक ताल्लुक़ात का नज़रिया था। इसी तरह जैसे कि आज अमेरीका और कैनेडा के दरमयान दोस्ताना ताल्लुक़ात हैं, लेकिन तक़्सीम-ए-हिंद के वक़्त कुछ तल्ख़ तजुर्बात और मसला-ए-कश्मीर की वजह से दोनों का ख़ाब शर्मिंदा-ए-ताबीर नहीं हो सका।

उन्होंने दोनों ममालिक के सियासतदानों को मश्वरा दिया कि अपने नज़रिया पर उस वक़्त भी अटल रहें जब उन की पार्टी अपोज़ीशन में आ जाए। उन्होंने दावा किया कि ख़ुद उन्होंने कभी भी अपना मौक़िफ़ तब्दील नहीं किया है। दहश्तगर्दी के बारे में उन्हों ने कहा कि पाकिस्तान दहश्तगर्दी की लानत का सब से बड़ा शिकार है।

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