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महिलाओं को न्याय देने के मामले में पाक और बांग्लादेश से भी पीछे है भारत

केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दायर कर तीन तलाक़ पर अपना विरोध जताया है। सरकार ने अपने हलफनामे में तर्क दिया कि वह किसी धर्म को निशाना नहीं बना रही है। सरकार का दावा है कि उसका ये कदम देश में लैंगिक समानता और महिलाओं को उनके संवैधानिक अधिकार दिलाने के लिए है। लेकिन सवाल यह है कि सरकार की मंशा है क्या मुस्लिम समाज की महिलाओं फिक्र है या इसके पीछे राजनीति है। अगर हम भारत की लैंगिक समानता और महिलाओं की अधिकार की बात करें तो वाकई हम काफी पिछड़े हुए हैं।

Gender Inequality Index (GII) 2014 के आंकड़ो पर नज़र डाले तो आपको जानकर हैरानी होगी कि भारत की स्थिति काफी दयनीय है । यहां तक कि पाकिस्तान और बांग्लादेश से भी इस पहलू पर भारत काफी पिछड़ा देश है।

यूएनडीपी की मानव विकास रिपोर्ट 2015 के मुताबिक लिंग असमानता इंडेक्स यानि जीआईआई 2014 के आंकड़े बताते हैं कि 155 देशों में महिला असमानता के मामले में भारत 130वें पायदान पर है जबकि पाकिस्तान की 111वीं और बांग्लादेश की 121वीं रैंकिंग है।

इसके अलावा दक्षिण एशियाई देशों में से अफ़गानिस्तान केवल ऐसा देश है जिसके मुकाबले भारत स्थिति कुछ बेहतर है । अफ़गानिस्तान लैंगिक असमानता को लेकर 152वें स्थान पर है।

वैसे महिलाओं की राजनैतिक और अन्य मज़दूर क्षेत्र में भागीदारी भारत के लिहाज़ से काफी पिछड़ी हुई है ।यहां तक कि अफ़गानिस्तान में भारत की तुलना में कहीं ज़्यादा महिला विधायक हैं । जहां भारत में 12.2 सीट महिलाओं के लिए है वहीं अफ़गानि्तान में यह आंकड़ा 27.6 फीसदी है । इसके अलावा भारत, महिला हक़-हक़ूकों के ख़िलाफ़ होने वाली हिंसा में भी भारत अव्वल है ।

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