मादरे वतन की आज़ादी के लिए मुसलमानों की अज़ीम क़ुर्बानियां

मादरे वतन की आज़ादी के लिए मुसलमानों की अज़ीम क़ुर्बानियां
आदिलाबाद, 21 मार्च: मुल्क की आज़ादी में हिस्सा लेने वाले 52 हज़ार उल्मा की कुर्बानियों को फ़रामोश नहीं किया जा सकता। हिन्दुस्तान हमारा अपना मुल्क है हम किराये दार नहीं। इन ख़्यालात का इज़हार मौलाना सय्यद सादिक़ नय्यर और मौलाना मुस्तफ़ा

आदिलाबाद, 21 मार्च: मुल्क की आज़ादी में हिस्सा लेने वाले 52 हज़ार उल्मा की कुर्बानियों को फ़रामोश नहीं किया जा सकता। हिन्दुस्तान हमारा अपना मुल्क है हम किराये दार नहीं। इन ख़्यालात का इज़हार मौलाना सय्यद सादिक़ नय्यर और मौलाना मुस्तफ़ा मज़ाहरी लातूर ने अपने मुशतर्का ख़िताब के दौरान किया। मुस्तक़र आदिलाबाद में उस्मानिया मस्जिद के रूबरू मुनाक़िदा जलसा मुल्क की आज़ादी और हम के मौक़ा पर इन उल्मा ने बतौरे मेहमान ख़ुसूसी की हैसियत से शिरकत की।

अपने ख़िताब का तसलसुल बरक़रार रखते हुए उन्होंने फ़िकरो परस्त तनज़ीमों पर इल्ज़ाम आइद किया और मुल्क के मुसलमानों को मशकूक नज़र से देखने पर उन्हें इंतिबाह दिया और कहा कि मुल्क की आज़ादी में कांग्रेस से ताल्लुक़ रखने वाले क़ाइदीन के हिस्सा लेने से 80 साल पहले से मुल्क के मुसलमान आज़ादी की जद्दो जहद कर रहे थे। दिल्ली की चांदनी चूकता लाहौर शाहराह पर पाए जाने वाले तमाम दरख़्तों पर उल्मा की नाशों को हाथों के ज़रीया लेजाकर अंग्रेज़ों ने लटकाया था।

हिन्दुस्तान की आज़ादी के लिए जंग का सिलसिला 1803 में शुरू हुआ जबकि 1857 में कांग्रेस का वजूद अमल में आया। मोहन दास करम चंद गांधी को महात्मा गांधी का ख़िताब शाह अबदुलअज़ीज़ मुहम्मद देहलवी ने अता किया। मुनज़्ज़म तरीक़े से अंग्रेज़ों का मुक़ाबला करने की ग़रज़ से 1826 में दारुल उलूम देवबंद का क़ियाम अमल में लाया गया। महात्मा गांधी को तमाम मुल्क का दौरा कराने वाले दारुल उलूम देवबंद के तलबा थे।

अंग्रेज़ों ने मुसलमानों में दराड़ डालने की ग़रज़ से कादियानी फ़िर्क़े का वजूद अमल में लाया। मौलाना मुस्तफ़ा मज़ाहरी, मौलाना सादिक़ ने हुकूमत पर इल्ज़ाम आइद किया कि वो हक़ीक़ी तारीख को मसख़ करते हुए तालीमी निसाब में ऐसी तारीख शाय कर रही है जिस से हक़ीक़त का कोई ताल्लुक़ नहीं। जबकि मुल्क में ज़ाइद अज़ सौ साल उल्मा ने अपनी क़ुर्बानियां पेश की जिस को नज़रअंदाज करते हुए हमारे जमहूरी मुल्क में मुसलमानों का ख़ून पानी से सस्ता हो कर रह गया है।

मुल्क पर हमारा बराबर का हक़ होने के बावजूद ज़िंदगी के हर शोबे में मुसलमानों को नज़रअंदाज किया जा रहा है। मुल्क में दहश्त पसंदों की जानिब से जहां भी धमाके हुए हैं तो मुसलमानों को ज़िम्मेदार क़रार दिया जाता है। जबकि इस्लाम में दहश्त पसंदी का कोई मुक़ाम नहीं। इस्लाम तो सिर्फ़ अमन भाई चारगी का पैग़ाम दिया करता है। अपने ख़िताब में मुजाहिदीन आज़ादी मौलाना मुहम्मद अली जौहर, शौकत अली, मौलाना आज़ाद , मौलाना सय्यद अहमद शहीद, मौलाना रशीद अहमद गंगोही, बहादुर शाह ज़फ़र, शाह अबदुल अज़ीज़ मुहद्दिस देहलवी, शाह इस्माईल, मौलाना सय्यद अहमद, मौलाना फ़ज़लुर्रहमान, मौलाना अबदुर्रशीद,।

मौलाना महमूद हसन शेखुल हिंद, मौलाना हुसैन अहमद मदनी हाजी इमदादुल्लाह मक्की के रोंगटे खड़ा करदेने वाले वाक़ियात से वाक़िफ़ करवाया और मुक़ामी अफ़राद को मश्वरा दिया कि इस तर्ज़ के इजतिमाआत मुनाक़िद करते हुए नौजवान नसल को मुल्क की आज़ादी की हक़ीक़त से वाक़िफ़ कराएं। रात देर गए मस्जिदे उस्मानिया इमाम ख़तीब मौलाना इस्लामुद्दीन के शुक्रे पर जलसे का इख़तेताम अमल में लाया गया जबकि इब्तिदा में मस्जिदे उस्मानिया में दीनी तालीम हासिल करने वाले तलबा और तालिबात ने अपना तालीमी मुज़ाहिरा पेश किया।

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