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मायावती को नहीं है मुसलमानों की जरूरत

2007 के असेम्बली इलेक्शन में मुस्लिम वोटो की मदद से मुकम्मल अक्सरियत के साथ उत्तर प्रदेश की सत्ता हासिल करने वाली बहुजन समाज पार्टी की चीफ मायावती ने पांच साल की अपनी हुकूमत के दौरान और हुकूमत जाने के बाद से अब तक बार-बार यही जाहिर कि

2007 के असेम्बली इलेक्शन में मुस्लिम वोटो की मदद से मुकम्मल अक्सरियत के साथ उत्तर प्रदेश की सत्ता हासिल करने वाली बहुजन समाज पार्टी की चीफ मायावती ने पांच साल की अपनी हुकूमत के दौरान और हुकूमत जाने के बाद से अब तक बार-बार यही जाहिर किया है कि उन्हें मुसलमानों की कोई जरूरत नहीं है, वह तो बस दलितों और ब्राहमणों के भरोसे दोबारा रियासत की सत्ता हासिल कर लेंगी और लोकसभा इलेक्शन में भी 30 से ज्यादा सीटें जीत लेंगी।

दलित ब्राहमण भाई-भाई मुस्लिम कौम कहां से आई इसी नारे पर अमल करते हुए मायावती ने गुजिश्ता दिनों लखनऊ में 2014 के लोकसभा इलेक्शन के लिए अपनी पार्टी के उम्मीदवारों का नए सिरे से ऐलान किया। इस मौके पर उन्होंने जिन 36 उम्मीदवारों के नामों का ऐलान किया है। उनमें बीस ब्राहमण हैं और एक भी मुस्लिम नाम नहीं है। इन उम्मीदवारों में कई ब्राहमण उम्मीदवार ऐसे हैं जो इस वक्त भी लोकसभा या राज्य सभा के मेम्बर हैं।

सीतापुर से कैसर जहां, संभल से शफीकउर्रहमान बर्क, मुजफ्फरनगर से कादिर राणा और कैराना से तबस्सुम हसन बहुजन समाज पार्टी की मौजूदा लोकसभा मेम्बर हैं। मायावती ने इन चारों में से किसी को भी अगली बार अपनी पार्टी का उम्मीदवार बनाने का ऐलान नहीं किया है।

आमतौर पर सयासी पार्टियां लोकसभा या अमेम्बली इंतेखाबात के लिए जब अपने उम्मीदवारों के नामों की फहरिस्त जारी करती हैं तो पहली फहरिस्त में ही सिटिंग मेम्बरान के नाम का ऐलान करती हैं। मायावती ने ऐसा नहीं किया इससे लगता है कि शायद वह अपनी पार्टी के चारो लोकसभा मुस्लिम मेम्बरान को अगली बार अपनी पार्टी का टिकट नहीं देना चाहती।

2012 में असेम्बली इलेक्शन हारने के बाद मायावती ने बड़ी हटधर्मी के साथ कहा था कि उत्तर प्रदेश का 80 फीसद मुसलमान समाजवादी पार्टी के साथ चला गया इसलिए उनकी पार्टी इलेक्शन हार गई। जवाब में मुलायम सिंह ने कहा कि उनकी पार्टी को तो उत्तर प्रदेश के सौ फीसद मुसलमानों ने वोट दिया और पूरी अक्सरियत के साथ उनकी हुकूमत बनीं है।

मायावती तो मुसलमानों पर वोट ना देने का इल्जाम लगाकर अक्सर उन्हें बुरा भला कहती रहती हैं लेकिन रियासत में मुसलमानों के मुकाबले आधे से भी कम आबादी वाले ब्राहमणों के साथ उनकी मोहब्बत में दिन दूना रात चैगुना इजाफा ही होता रहता है। लोकसभा के पिछले इलेक्शन में मायावती की पार्टी के उम्मीदवार बेश्तर ऐसे हलकों से इलेक्शन हार गए थे जिन हलकों में ब्राहमण आबादी ज्यादा थी।

इसके बावजूद इलेक्शन हरवाने का इल्जाम उन्होंने मुसलमानों पर ही लगाया था। गुजश्ता असेम्बली इलेक्शन हारने के बाद उन्होने अपनी पार्टी के लोगों को यह एहसास दिलाने की कोशिश की कि उनकी पार्टी के जनरल सेक्रेटरी सतीश मिश्रा पार्टी को ब्राहमण वोट नहीं दिला पाए इसलिए उन्होंने पार्टी में सतीश मिश्रा की अहमियत कम करके उन्हें सिर्फ अदालती कामों तक महदूद कर दिया है।

लेकिन अब उन्होंने लोकसभा के लिए अपनी पार्टी के उम्मीदवारों का ऐलान करते हुए सतीश मिश्रा की हैसियत में अचानक फिर इजाफा कर दिया और यह ऐलान किया कि 4 मई से 7 जुलाई तक 36 लोकसभा हलकों में बहुजन समाज पार्टी की जानिब से ब्राहमणों के जलसे किए जाएंगे।

इन तमाम जलसों के चीफ गेस्ट सतीश मिश्रा ही होंगे। अक्सर मायावती जब इस किस्म के जलसो का ऐलान किया करती थी तो साथ में वह मुसलमानों और पिछड़ों के जलसों का भी ऐलान कर दिया करती थी लेकिन इस बार ऐसा नहीं किया। एक तरफ तो मायावती का यह रवैया है दूसरी तरफ मुस्लिम वोटरो के खुदसाख्ता लीडर अहमद बुखारी जैसे सौदागर हैं जो अब यह कहते फिर रहे हैं कि मुसलमानों के मामले में कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के मुकाबले बहुजन समाज पार्टी की चीफ मायावती सबसे अच्छी हैं।

हालांकि अहमद बुखारी और उनके मरहूम वालिद दोनों ही कई साल कब्ल मायावती और बहुजन समाज पार्टी के बानी कांशीराम के हाथों अच्छी तरह बेइज्जत होकर घर बैठ चुके हैं। (शबीहुल हसन नकवी)

—————बशुक्रिया: जदीद मरकज़

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