Saturday , December 16 2017

मासूम तलबा को असातिज़ा की मारपीट के वाक़ियात में ख़तरनाक इज़ाफ़ा

लफ़्ज़ असातिज़ा सुनते ही हर किसी के ज़हन में एक हमदरद , शफीक , जज़बा ख़ुलूस से सरशार और तलबा को माँ बाप की तरह प्यार करने वाले , उन्हें बेहतर-ओ-मुशफ़िक़ाना अंदाज़ में ज़ेवर तालीम से आरास्ता और अच्छी तरबियत के ज़रीया ज़हन साज़ी करने व

लफ़्ज़ असातिज़ा सुनते ही हर किसी के ज़हन में एक हमदरद , शफीक , जज़बा ख़ुलूस से सरशार और तलबा को माँ बाप की तरह प्यार करने वाले , उन्हें बेहतर-ओ-मुशफ़िक़ाना अंदाज़ में ज़ेवर तालीम से आरास्ता और अच्छी तरबियत के ज़रीया ज़हन साज़ी करने वाली शख्सियत उभर कर आती है और हमें यक़ीन है कि टीचर का ज़िक्र आते ही लोग अपने ज़माने के उन असातिज़ा को याद कर के सुकून महसूस करते होंगे जिन्हों ने उन की ज़िन्दगियों को सजाने और संवारने में अहम रोल अदा किया है लेकिन अफ़सोस के साथ कहना पड़ता है कि बदलते दौर के साथ लफ़्ज़ असातिज़ा के मानी-ओ-मतलब भी बदल गए हैं और इस मुक़द्दस लफ़्ज़ पर भी इंतिहाई कमर्शियल चादर ढांक दी गई है ।
आज कल ये देखने में आरहा है कि स्कूलों में जो टीचर्स तलबा को सज़ाएं दे रहे हैं इन में अक्सरियत ख़ातून टीचरों की है जब कि टीचरों के हाथों पिटने वाले बेशतर तलबा की उम्र 6 और 10 साल के दरमियान है । एक अच्छे और हमदर्दाना अंदाज़ में तलबा को पढ़ाने की बजाय उन के साथ ज़ालिमाना सुलूक रवा रखा जा रहा है । कभी होमवर्क ना करने के नाम पर किसी मासूम की पिटाई की जा रही है तो कोई टीचर मासूम तालिब-ए-इल्म को सिर्फ़ इस लिये बेतहाशा मार रही है
क्यों कि वो तालिब-ए-इल्म दो दिन से स्कूल हाज़िर ना होसका । कुछ असातिज़ा एसे भी हैं जो बच्चों की मामूली शरारत पर उन्हें समझाने और शरारत ना करने की तरग़ीब देने की बजाय मारपीट के ज़रीया उन्हें शदीद ज़ख़मी कर रहे हैं जब कि इस मुक़द्दस पेशा तदरीस में बाअज़ ऐसे भेड़िये भी घुस आगए हैं जो अपनी हवस मिटाने के लिये गरीब तालिबात का जिन्सी इस्तिहसाल कर रहे हैं ।

ऐसे ही एक दरिन्दा ने शफीक उस्ताज़ की शक्ल में ज़ाहिर हो कर सनअत नगर की एक गरीब मुस्लिम तालिबा की अस्मत-ओ-इफ़्फ़त से खेलने की कोशिश की और लड़की को पढ़ाने के नाम पर इस के घर तक पहूंच गया और घर वालों का एतिमाद हासिल करते हुए 21 नवंबर को इस तालिबा का अग़वा कर के मंज़रे आम से ग़ायब होगया । जब कि पुलिस रत्नाकर नामी हैवान नुमा उस टीचर के बारे में कोई इक़दाम करने से गुरेज़ करती रही अगर असातिज़ा ही इस तरह की शैतानी हरकात करने लगें तो फिर उन की ज़ेर-ए- तरबियत नसल का हाल क्या होगा ? इस का तसव्वुर कर के ही हमारा वजूद काँप जाता है ।

चंद वाक़ियात में पुलिस और महिकमा तालीम के हुक्काम ने कार्रवाई करते हुए प्रिंसिपल ख़ाती टीचरों को गिरफ़्तार किया है और एक दो स्कूलों की मुस्लिमा हैसियत भी ख़त्म करदी गई । जैसा कि हम ने अपनी इबतिदाई सुतूर में ज़िक्र किया है कि मामूली मामूली बातों पर असातिज़ा तलबा को ख़तरनाक सज़ाएं दे रहे हैं इस सिलसिला में करनूल का 9 साला तालिब-ए-इल्म की मिसाल ली जा सकती है इस मासूम को ख़ातून टीचर ने इस बिना पर शदीद ज़द-ओ-कोब किया कि वो हिदायत के बावजूद अपनी कॉपियों और किताबों पर ब्राउन शीट चढ़ाकर लाने में नाकाम रहा चौथी जमात में ज़ेरे तालीम इस तालिब-ए-इल्म के हाथ में फ्रैक्चर आगया ।

असातिज़ा की हरासानी और तलबा के साथ गैर इंसानी-ओ-ज़ालिमाना सुलूक के पेश आए वाक़ियात में 6 साला कमसिन तालिब-ए-इल्म का वाक़िया बड़ा दर्द अंगेज़ रहा । टीचर ने होमवर्क ना करने की पादाश में उसे इतना मारा पीटा कि वो शदीद ज़ख़मी होगया । नतीजा में स्कूल और टीचर के ख़िलाफ़ पुलिस में शिकायत दर्ज करवाई गई । मार पीट ज़ुलम-ओ-ज़्यादती और मुख़्तलिफ़ सज़ाओं के ज़रीया तलबा में इलम का शौक़ पैदा नहीं किया जा सकता चूँकि पेशा तदरीस एक इंतिहाई मुक़द्दस , मुहज़्ज़ब और ज़िम्मा दाराना पेशा है

इसे में असातिज़ा को चाहीए कि वो ग़लत बरताव के ज़रीया मुसीबतों कोर्ट कचहरी के चक्करों को दावत ना दें ।वाज़ेह रहे कि तलबा-की ज़िन्दगियों को संवारने और उन के मुस्तक़बिल को रोशन बनाने में जहां असातिज़ा अहम ज़िम्मेदारी निभाते हैं वहीं उन के वालदैन का भी अहम रोल होता है ।

वालदैन को भी चाहीए कि अपने बच्चों को असातिज़ा के एहतिराम का सबक़ दें उन्हें एक अच्छा इंसान बनाने की कोशिश करें । उन के होमवर्क पर ख़ास तवज्जा दें ।तालीमी मुज़ाहिरों पर नज़र रखें और असातिज़ा से मुसलसल रब्त में रहें तब ही एक एसी नौजवान नसल को तय्यार करने में मदद मिलेगी जो मुलक-ओ-मिल्लत का सरमाया इफ़्तिख़ार होगी ।

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