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माह रमज़ान इबादात और ताआत का मौसम ख़ैर

हैदराबाद ।०४ अगस्त :अहल ईमान आपस में भाई भाई हैं ये ताल्लुक़दीनी राबिता और इस्लामी मुहब्बत का नतीजा है और बिलाशुबा ये ताल्लुक़ तमाम दुनयवी रिश्तों से कहीं ज़्यादा मज़बूत, पायदार और क़वी ही। तमाम मोमिनों की असल एक है ईमान ही दरहक़

हैदराबाद ।०४ अगस्त :अहल ईमान आपस में भाई भाई हैं ये ताल्लुक़दीनी राबिता और इस्लामी मुहब्बत का नतीजा है और बिलाशुबा ये ताल्लुक़ तमाम दुनयवी रिश्तों से कहीं ज़्यादा मज़बूत, पायदार और क़वी ही। तमाम मोमिनों की असल एक है ईमान ही दरहक़ीक़त हयात अबदी का मूजिब है इसी लिए तमाम अहल ईमान भाई भाई हैं बाहमी इत्तिहाद, उलफ़त, मुहब्बत और आपस में रहम करने का सबब तक़वा है और आपस की मुहब्बत और रहम-ओ-मुरव्वत अल्लाह की रहमत का मूजिब है अहादीस शरीफा से साबित है कि अल्लाह ताला अपने रहम करने वाले बंदों पर रहम फ़रमाता है जो लोगों पर रहम नहीं करता वो रहमत हक़तआला से महरूम रहता है एक मुस्लमान दूसरे मुस्लमान पर ज़ुलम ना करे उस को बेसहारा और तन्हा ना छोड़े उस की बेइज़्ज़ती और तहक़ीर ना करे उस की जान, माल और आबरू के दरपे ना रही।

बल्कि अपने दीनी भाई के लिए हमेशा ख़ैर ख़्वाही, हुस्न-ए-सुलूक, मुहब्बत, इज़्ज़त-ओ-एहतिराम और हर तरह उस की हिफ़ाज़त पर आमादा रहे ज़रूरत के वक़्त एक दूसरे का मुईन-ओ-मददगार और मुसीबत के वक़्त एक दूसरे का ग़मगुसार हो ज़ईफ़ और कमज़ोर मुस्लमान को क़वी और ताक़तवर मुस्लमान की उखुवत से क़ुव्वत हासिल हुआ करे और मुस्लमानों में इंतिशार-ओ-तफ़रीक़ का नाम-ओ-निशान ना रही।

डाक्टर सय्यद मुहम्मद हमीद उद्दीन शरफ़ी डायरेक्टर आई हरक ने रमज़ानमुबारक के रूह प्रवर और नूरानी माहौल में 12 रमज़ान उल-मुबारक को बाद नमाज़ ज़ुहरमीलाद महल, इलेवन पाग निज़द मोमिन पीठ और बाद नमाज़ अस्र हमीदिया शरफ़ी चमन में रोज़ादार मुस्लियों के नुमाइंदा इजतिमा से ख़िताब की सआदत हासिल करते होई इन हक़ायक़ का इज़हार किया। वो इस्लामिक हिस्ट्री रिसर्च कौंसल इंडिया (आई हरक) की हज़रत ताज अलारफ़ाइऒ यादगार ख़ताबात के सोलहवीं साल के 12 वें रोज़ के इजलासों सेख़िताब कर रहे थे जो करा-ए-त कलाम पाक से शुरू हुई।

बारगाह रिसालत ऐमीं हदयानाअत पेश की गई। डाक्टर हमीद उद्दीन शरफ़ी ने कहा कि ईमान की असल ने सारे मुस्लमानों को एक दूसरे से जोड़ कर उन्हें बाहमी मुहब्बत , मुवानिस्त, रहम-ओ-हमदर्दी और मुरव्वत ईसार से नवाज़ा है और रिश्ता उखुवत की क़ुव्वत से बहरामंद करके सारीमिल्लत को जसद वाहिद बना दिया है कि एक की ख़ुशी सब की ख़ुशी और एक का दर्द सब का दर्द हो गया ऐसी मिसाल कहीं नहीं मिलती ।

उन्हों ने उलूम क़ुरआन-ओ-हदीस से मुस्लमानों की दिलचस्पी को समुरा सालहीत क़रार देते होई कहा कि इलमी असासों कीहिफ़ाज़त और तालीमी मराकज़ की सयानत-ओ-तरक़्क़ी के लिए माली ईसार और ख़िदमात हमारी ख़ुसूसी रिवायत रही है।

तलबए उलूम दयनीय हमारी माली तो जिहात के मुस्तहिक़हैं उन की जुमला मदात ख़ैर से इआनत हुसूल बरकात ख़ास का मूजिब होंगी।आख़िर में बारगाह रिसालत ई में सलाम गुज़राना गया और रक्त अंगेज़ दुआए की गईं।

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