मित्रहीन हो चुके हैं हम और अहसास तक नहीं!

मित्रहीन हो चुके हैं हम और अहसास तक नहीं!

एक बार मेरी और मेरे साथी की बात चल रही थी। बात इस मुद्दे पर अटक गई कि कौन सच्चा दोस्त और मददगार होता है, कौन नहीं। मैंने उससे पूछा कि तुम्हारा कौन दोस्त है? उसने तपाक से जवाब दिया- बहुत से। मैंने उससे चार दोस्तों के नाम बताने को कहा। दस मिनट सोचने के बाद उसने बमुश्किल एक नाम लिया। मुझे लगा कि वह नाम भी उसने इस शर्मिंदगी से बचने के लिए ले लिया कि कहीं मैं यह न कह बैठूं कि तेरा तो एक भी सच्चा दोस्त नहीं है।

चर्चा आगे बढ़ी तो साथी ने सवाल दागा कि फिर सच्चा दोस्त कौन है? मैंने उसे बताया कि जब हम मुसीबत में हों तो सबसे पहले जिस आदमी का नाम हमें याद आए, वही हमारा असल दोस्त है। मजे की बात यह कि कई बार यह वह व्यक्ति होता है, जिसे हम अपना दुश्मन समझ रहे होते हैं। पर इस सच्चे दोस्त के साथ हम न ज्यादा हंसते-बोलते हैं, न साथ घूमते हैं। उसके साथ हम कम से कम समय बिताते हैं। यह बात सुनकर मेरा साथी मेरा मुंह ताकने लगा, मानो मैंने उसके मन की बात जान ली हो।

लगता है, दुनिया अकेली हो गई है। लोग भीड़ में अकेले घूम रहे हैं और सबको सच्चे दोस्त की तलाश है। निदा फाजली ने ठीक लिखा है- हर तरफ, हर जगह बेशुमार आदमी। फिर भी तनहाइयों का शिकार आदमी। मैं संसद तक में देखता हूं कि संसद भवन में सांसद बैग पकड़े, सिर झुकाए आते हैं और चुपचाप निकल जाते हैं। वहां उनको कोई ऐसा नहीं लगता जिसके साथ हंस-बोल लें, कुछ क्षण बैठ कर गप्पें लगा लें।

आजकल की दोस्ती में हमें किसी पर विश्वास ही नहीं रहा। दोस्ती तो तब है, जब अतरंग से अतरंग बातें भी एक-दूसरे से बेहिचक साझा की जा सकें। पर आजकल हर दूसरे आदमी से हमें डर लगता है कि कहीं वह हमारे नाम का गलत फायदा न उठा ले, हमारी चुगली न कर दे या हमें नुकसान न पहुंचा दे। क्या विडंबना है कि जिसे हम दोस्त कह रहे हैं, उसी से डर रहे हैं। जिसके साथ हम समय बिता रहे हैं, उससे भी खुल नहीं पा रहे।

कुछ लोग कहते हैं, आजकल दुश्मन ज्यादा भरोसेमंद हैं क्योंकि हमें पता है कि वे कहां तक नुकसान पहुंचा सकते हैं। बहुत-से लोगों की पीड़ा यह है कि उनके पास कोई ऐसा दोस्त नहीं है जिससे वे खुलकर मन की बातें कर सकें। बातें करने के लिए कोई रह गया है तो ले-देकर पत्नी है, लेकिन वहां भी कुछ न कुछ खटपट लगी रहती है। भाई-बहन भी नहीं क्योंकि अब हम उनके साथ भी बड़े घर और बड़ी कार की होड़ लगा रहे हैं।

जानते हैं, हमारे दोस्त क्यों नहीं बन रहे? असल में हम अपने बच्चों को शुरू से वन-अपमैनशिप सिखाते हैं कि तुम दूसरों से एक कदम आगे रहना। जब बच्चा अपने दोस्तों के साथ किसी रेस्ट्रॉन्ट में जाता है तो उसके लौटते ही सबसे पहले हम पूछते हैं कि पैसे किसने खर्च किए? हम उसे दोस्तों पर खर्च करना नहीं, दूसरों के पैसे खर्चवाना सिखाते हैं। फिर क्यों कोई आपके बच्चे को पसंद करेगा? जब आपका बच्चा आपके सामने लगातार अपने दोस्त की तारीफ करता है तो यह तारीफ भी आपको चुभती है। जब आपका बच्चा अपने किसी दोस्त के किसी काम के लिए मरा जाता है तो भी आप मुंह बनाते हैं और उल्टा सवाल करते हैं कि वह तुम्हारे लिए क्या करता है? क्या हम बच्चों को दोस्ती में भी फायदा ढूंढने के संस्कार नहीं दे रहे?

दोस्ती निःस्वार्थ त्याग मांगती है, समय मांगती है। दोस्ती तब होती है, जब दूसरे को लगता है कि आप उसकी चिंता करते हैं। हमने कई बार देखा है कि दोस्त का जरूरी काम पड़ने पर हम कोई तकनीकी बहाना बनाकर बचते हैं और सोचते हैं कि इस बहाने को वह सच मानेगा और हमारी दोस्ती में कोई फर्क नहीं आएगा। लेकिन फिर जब हमें काम पड़ता है तो उधर से भी तकनीकी बहाना आ जाता है। कहते हैं कि हमारी भावना ही हम तक लौटकर आती है। कई बार हम दोस्ती और चाटुकारिता में फर्क नहीं कर पाते। असल दोस्त वह है जो आपके मुंह पर सही को सही और गलत को गलत बोलने की ताकत रखता हो। लेकिन हम सामने वाले को दोस्त भी कह रहे हैं और उससे ईर्ष्या भी कर रहे हैं कि कहीं वह हमसे आगे न निकल जाए! कितने दोस्त ऐसे हैं जो दोस्त को खुद से आगे निकलता देख खुश होते हैं?

दोस्ती में हमारे संस्कारों की अहम भूमिका होती है। जिन लोगों ने अपने सगे रिश्तेदारों तक से सारे हिसाब-किताब कर लिए, वे दोस्तों को क्या छोड़ेंगे? मुझे आज तक ऐसा कोई उदाहरण नहीं मिला जिसमें किसी ने अपनी प्रॉपर्टी अपने उस दोस्त के नाम की हो जिसने जिंदगी भर उसके बच्चों और भाइयों से बढ़कर भी उसका साथ दिया हो।

बहुत-से लोग कहते हैं कि दोस्ती तब होती है जब आपको किसी से काम नहीं होता। मेरा मानना इससे बिल्कुल उलट है। मुझे लगता है कि दोस्ती तब होती है जब कोई आदमी सुख-दुख का साथी बनता है। जब हम एक-दूसरे के काम आते हैं तो धीरे-धीरे निकटता बढ़ती है। कई बार मैं लोगों से कहता हूं कि आप मेरा काम करिए, उससे आपका विश्वास मुझमें बढ़ जाएगा। क्योंकि तब आपको लगेगा कि जब आपने मेरा भला किया है तो मैं आपका बुरा क्यों करूंगा। जिंदगी में किसी भी मोड़ पर सिर्फ एक अच्छा दोस्त मिल जाए तो वह हजार के बराबर है। वह सभी हीरों में कोहिनूर है।

अहमद फराज ने लिखा है- ज़िंदगी से यही गिला है मुझे, तू बहुत देर से मिला है मुझे। हमसफर चाहिए हुजूम नहीं, इक मुसाफिर भी काफिला है मुझे।

लेखक: विजय गोयल

(लेखक संसदीय कार्य राज्य मंत्री हैं)

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