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मिस्र की पार्लीमैंट तहलील(रोकना)

मिस्र की सुप्रीम कोर्ट ने नौ मुंतख़ब(चुना हुवा) पार्लीमैंट को तहलील (रोकना)करने का हुक्म दिया तो जुमा के दिन फ़ौजी हुकमरानों ने इस पर अमल करते हुए पार्लीमैंट तहलील करदी। इमारत के अतराफ़ सैक्योरिटी फ़ोर्स को ताय्युनात(जमा) करदिया गया

मिस्र की सुप्रीम कोर्ट ने नौ मुंतख़ब(चुना हुवा) पार्लीमैंट को तहलील (रोकना)करने का हुक्म दिया तो जुमा के दिन फ़ौजी हुकमरानों ने इस पर अमल करते हुए पार्लीमैंट तहलील करदी। इमारत के अतराफ़ सैक्योरिटी फ़ोर्स को ताय्युनात(जमा) करदिया गया ताकि क़ानून साज़ों के इलावा(दुसरे) किसी को भी पार्लीमैंट की इमारत में दाख़िल( अंदर आना ) होने ना दिया जाय।

मिस्र में इस तबदीली से अचानक नया बोहरान का पैदा होना मुक़ामी सतह पर अमन के लिए मुनासिब नहीं है। अदालत (कोर्ट )ने हसनी मुबारक के दौर के ख़ातमा के बाद करवाए गए इंतिख़ाबात और जदीद( नया ) मिस्र के पहले जमहूरी तौर पर मुंतख़ब(चुना हुवा) अरकान को ग़ैर आईनी क़रार(खानूनी ) दे कर मिस्र के अवाम को नई मुश्किलात से दो-चार करदिया।

सुप्रीम कोर्ट का ये हुक्म एक ऐसे वक़्त सामने आया जब इसी हफ़्ता सदारती इंतिख़ाब केलिए राय दही(यालेक्शन) होने वाली है। गुज़श्ता(पिछले ) साल सदर हसनी मुबारक की बेदखली(निकलागाया ) के बाद से मिस्र को एक हक़ीक़ी जमहूरीयत में तबदील करने का ख़ाब अधूरा(न मुकमिल ) रह गया है। पारलीमानी इंतिख़ाबात में अगर चीका इस्लाम पसंदों का ग़लबा था, अब इस्लाम पसंद तंज़ीम इख़वान अलमुस्लिमीन ने अदालत की रोलिंग और इस के इख़्तयारात पर तनाज़ा पैदा किया है ।

फ़ौज की ज़ेर क़ियादत हुकूमत ने अदालत(कोर्ट ) के फ़ैसला पर फ़ौरी अमल करते हुए इख़वान अलमुस्लिमीन के सदारती उम्मीदवार के इमकानात को भी मौहूम बनाने की कोशिश की है। किसी भी मुल्क में एक आज़ाद अदलिया बेबाक अदलिया जब अपना असर दिखाती है तो हुकमरानों के लिए किसी डरावने ख़ाब से कम नहीं होती।

मिस्र के कई क़ाइदीन के लिए भी अपने मुल़्क की सुप्रीम कोर्ट का हुक्मनामा एक तरह के डर-ओ-ख़ौफ़ से कम नहीं। इख़वान अलमुस्लिमीन के लिए अदालत(कोर्ट ) का फ़ैसला सब से बड़ा धक्का है क्यों कि वो काफ़ी जद्द-ओ‍जहद(कोशिश )के बाद पार्लीमैंट पर ग़लबा हासिल करने में कामयाब हुई थी।

सवाल ये पैदा होरहा है कि अदलिया के फ़ैसला के बाद आया इस्लाम पसंद ग्रुप आइन्दा के इंतिख़ाबात में इस तरह अपना असर बरक़रार रखने में कामयाब होसकेगा या नहीं। अगर ये तंज़ीमें अदलिया के फ़ैसले से होने वाले सयासी नुक़्सानात बर्दाश्त करने की मुतहम्मिल नहीं होंगी तो उन के लिए ये हुक्मनामा सब से बड़ा सयासी धक्का है।

मिस्र में एक मुक़ामी और आज़ाद अदलिया का तसव्वुर भी क़ानून और इंसाफ़ के नाम पर एक फ़ौजी और सियोल हुक्मरानी के माबैन फ़र्क़ पैदा करने की कोशिश के कई मनफ़ी(नाकाम) नताइज बरामद होंगे। इस्लाम पसंद तंज़ीमें आगे चल कर ऐसे क़वानीन बनाने और एक ऐसी अदलिया लाने पर काम करेंगी जिस के ज़रीया वो अपने ढब की ख़ानासाज़ अदलिया तशकील दे सकें।

अदलिया की जानिब से पार्लीमैंट तहलील करदेने के फ़ैसला के बाद मिस्र के फ़ौजी हुकमरानों ने कोई ब्यान जारी नहीं किया। अलबत्ता फ़ौजी हुकमरानों को सदारती इंतिख़ाबात के बाद पार्लीमैंट की क़ानूनी ज़िम्मेदारीयों को पूरा करने इक़दामात करने होंगे ता के मुल्क में अमन-ओ-अमान को कोई नुक़्सान ना पहूंच सके। मिस्र की अदालत के हुकमनामे के बाद ये भी अंदेशे पैदा होरहे हैं के अगर फ़ौजी हुकमरानों ने मलिक के हालात पर अपनी गिरिफ़त मज़बूत नहीं की तो 20 साल क़बल (पहले )अल्जीरिया की इस्लाम पसंद पार्टी ज़ेर क़ियादत पार्लीमैंट की तहलील के बाद जो सूरत-ए-हाल और ख़ानाजंगी भड़की थी ऐसे हालात मिस्र में पैदा होंगे। इस अंदेशे को दूर करने के लिए ज़रूरी है कि मिस्र में बग़ावत के जज़बा को कम करके जमहूरी तर्ज़-ए-ज़िंदगी को तर्जीह देने की कोशिश की जाय।

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