Tuesday , December 12 2017

मुजरिमाना रिकार्ड रखने वालों को सरकारी मुलाज़मत नहीं

नई दिल्ली। 17 अक्टूबर (पी टी आई)। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जो शख़्स मुजरिमाना मुक़द्दमात का सामना कररहा है, उसे हुकूमत में सरकारी मुलाज़मत के लिए मौज़ूं समझा नहीं जा सकता। उसे उस वक़्त तक सरकारी मुलाज़मत नहीं मिल सकता, तावक़तीके वो इल्ज़ा

नई दिल्ली। 17 अक्टूबर (पी टी आई)। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जो शख़्स मुजरिमाना मुक़द्दमात का सामना कररहा है, उसे हुकूमत में सरकारी मुलाज़मत के लिए मौज़ूं समझा नहीं जा सकता। उसे उस वक़्त तक सरकारी मुलाज़मत नहीं मिल सकता, तावक़तीके वो इल्ज़ामात से बरी होजाएं। कांस्टेबल शेख़ नज़र उल-इस्लाम के तक़र्रुर को कलअदम क़रार देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि बिलाशुबा हुक्काम को कांस्टेबलों के तक़र्रात अमल में लाने की ज़िम्मेदारी होती है, इस के साथ इन का ये फ़र्ज़ भी है कि वो ऐसे उम्मीदवारों का पस-ए-मंज़र मालूम करें और ये पता चलाया जाय कि उन पर कोई फ़ौजदारी मुक़द्दमा है या नहीं? कांस्टेबल ओहदा के लिए एक मुनासिब फ़र्द का तक़र्रुर ज़रूरी है। जब तक कोई उम्मीदवार फ़ौजदारी मुक़द्दमा से बरी नहीं होता, इस का तक़र्रुर अमल में नहीं लाया जा सकता। जस्टिस आर वे रवींद्रन और ए के पटनाइक पर मुश्तमिल बैंच ने मग़रिबी बंगाल हुकूमत की अपील पर ये फ़ैसला सुनाया है। हाईकोर्ट ने फ़ौजदारी इल्ज़ामात का सामना करने वाले कांस्टेबल नज़र उल-इस्लाम के तक़र्रुर की इजाज़त दी थी।

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