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मुज़फ़्फ़रनगर दंगों में मुसलमानों को मारने वाले भी हिंदू और बचाने वाले भी हिंदू थे

हबीब-उर-रहमान, नई दिल्ली।  जामिया नगर स्थित सैयदैन मंजिल में शनिवार को ‘गुफ्तगु’ प्रोग्राम का आयोजन किया गया। इस बार गुफ्तगु के वक्ता मानवाधिकार कार्यकर्ता और लेखक हर्ष मंदर थे। उन्होंने मुज़फ़्फ़रनगर दंगों के तीन साल पूरे होने पर अपनी बात रखी। हरश मंदर तीन साल पहले हुए मुज़फ़्फरनगर में हुए सांप्रदायिक दंगों का आंखो-देखा हाल बयान कर रहे थे। उन्होंने बताया कि कैसे दंगों में लोगों को परेशानियों का सामना करना पड़ा। केंद्र और राज्य सरकारों ने जानबुझकर लोगों की मदद नहीं की। जब लोग रिलिफ कैम्प के मदद की गुहार की, तो उन्होंने किसी भी प्रकार की मदद देने से इंकार कर दिया। ऊपर से पीड़ितों पर यह इल्ज़ाम लगाया गया कि वो मुफ़्त में खाने-पीने के लिए कैम्पों में रह रहे हैं। लोग घर लौट सके इसके लिए सरकार ने कोई तात्कालिक कदम नहीं उठाया।

हर्ष मंदर ने कहा कि मुज़फ़्फ़रनगर में कई जगहों पर मुसलमानों की हालत अब पाकिस्तान के मुहाजिरों जैसी है। अगल-बगल के लोग उनसे कोई हमदर्दी नहीं रखते। उनके पास किसी भी प्रकार की सुविधाएं नहीं बची है। न तो उनके पास रोजगार का ठिकाना है और न ही उनको अपने खेतों में जाने दिया जाता है। उनके बच्चों की पढ़ाई छूट चुकी है। हर्ष मंदर ने कहा कि जहां तक इंसाफ का सवाल है तो वह उत्तर प्रदेश में बहुत कम है। पुलिस का रवैया काफी पक्षपाती है। उन्होंने बताया कि जब शाहनवाज़ की हत्या की गई तो पुलिस ने कहा कि दो लोगों के अलावा वहां कोई नहीं था। इसलिए किसी भी प्रकार का केस नहीं बनाया गया। अपराधियों के खिलाफ जब गिरफ्तारी की मांग उठाई गई तो पुलिस ने कहना शुरू कर दिया कि जब वे गिरफ्तारी के लिए पहुंचते है तो औरतें उनका रास्ता रोक लेती हैं। उसके बाद सवाल यह था कि आखिर औरतों को कैसे पता चलता था कि पुलिस गिरफ्तारी के लिए आ रही है?

रहीम नाम के एक पीड़ित का वाक़या बताते हुए हर्ष मंदर ने कहा कि जब वह अपने अब्बू के साथ पुलिस के पास जाता था तो पहले से ही पुलिस अधिकारी मुख्य अभियुक्तों को वहां कुर्सी पर बैठाकर रखे हुए होती थी। उसके बाद एसीपी कहता कि बात को मत बढ़ाइए और समझौता कर लीजिए। ऊपर से पीड़ितों से कहा जाता कि चूंकि केस बनाना जरूरी है इसलिए गांव के किसी छोटे लोग या मजदूर किस्म के लोगों का नाम डाल दो, जिनका कोई राजनीतिक रसूख नहीं हो। अगर कोई इसके लिए तैयार नहीं होता था तो दूसरे केस में नाम डालकर कॉम्पर्माइज का दबाव बनाया जाता था। मुज़फ़्फ़रनगर घटना में लगभग 50 हजार लोग बेघर हुए। 30 हजार लोग शरणार्थी कैपों में रहने को मजबूर हुए।

हर्ष मंदर ने कहा कि मुज़फ़्फ़रनगर दंगों में बहुत घृणित कार्य हुए। पर वहां का एक दूसरा पहलू भी है। इस पर लोग अक्सर बात करना भूल जाते हैं। वो कहते हैं कि रहीम ने उनसे अपनी आपबीती बताते हुए कहा था कि प्रधान ने, उसके पड़ोसियों ने, उन लोगों को मारा। फिर उसने अपने बचपन के दोस्तों को देखा। लेकिन लोग बचाने के लिए भी आगे आए। रहीम ने एक व्यक्ति के बारे में बताया। उसने कहा कि उसके गांव में एक बबलू नाम के व्यक्ति थें। उनकी छवि लोगों के बीच गुंडों वाली थी। यही वजह है कि अधिकतर मुस्लिम उनसे मिलने में कतराते थे। लेकिन जब नरसंहार हुआ तो एक दिन बबलू मस्जिद पहुंचे, जहां करीब 150 लोग डर कर छिपे हुए थे। उन्होंने पीड़ितों को बचाने के लिए अपना ट्रैक्टर लाया। सबको बैठाकर अपने पोल्ट्री फार्म पर ले गए। जब वो बचाने के लिए आए तो लोगों ने उनको रोकने की कोशिश की, मगर उन्होंने कहा कि अगर किसी ने इन्हें (मुसलमानों को) छूने की कोशिश की तो ठीक नहीं होगा। चूंकि वो एक बाहूबली किस्म के व्यक्ति थे इसलिए लोग पीछे हट गए। रहीम ने कहा कि बबलू ने न सिर्फ हम डेढ़ सौ लोगों को बचाया बल्कि अपने भैसों को लाकर हमें सौप दिया। भैसों का दूध निकालकर हमें दिया। हमारे खाने-पीने का इंतजाम किया। लोगों को अपने दो मोटर साइकल और एक मारूति-800 कार से जितना हो सका मुसलमानों को बचा बाहर ले गए। इसके अलावा रहीम ने एक घटना का और जिक्र किया। एक बुजूर्ग औरत, जो मारे गए पांच लोगों के परिवार की थीं, को एक जाट औरत ने अपनी सास बनाकर रखा और उसकी जान बचाई।

हर्ष मंदर कहते है कि गुजरात हो या मुज़फ़्फ़रनगर, ऐसे जगहों पर नफ़रत और मुहब्बत करने वाले दोनों होते है। उन्होंने जोर देकर कहा कि बचाने वालों की चर्चा करना हम अक्सर भूल जाते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि इस नफ़रत भरे दौर में मुहब्बत करने वालों को नहीं भूलना चाहिए। मुज़फ़्फ़रनगर को याद करते समय उस बबलू और विनोद जैसों को याद करना जरूरी है।

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