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मुल्क की मुनफ़रिद फ़न तामीर की हामिल जामे मस्जिद एवान बेगम पेट

नुमाइंदा ख़ुसूसी - शहर हैदराबाद फ़र्ख़ंदा बुनियाद को दुनिया भर में जहां तहज़ीब-ओ-तमद्दुन , अदब-ओ-एहतिराम मेहमान नवाज़ी , ख़ुदातरसी , रहमदिल , एहतिराम इंसानियत , मुहब्बत-ओ-मुरव्वत जैसी ख़ुसूसियात के लिये जाना जाता है । वहीं इस शहर क

नुमाइंदा ख़ुसूसी – शहर हैदराबाद फ़र्ख़ंदा बुनियाद को दुनिया भर में जहां तहज़ीब-ओ-तमद्दुन , अदब-ओ-एहतिराम मेहमान नवाज़ी , ख़ुदातरसी , रहमदिल , एहतिराम इंसानियत , मुहब्बत-ओ-मुरव्वत जैसी ख़ुसूसियात के लिये जाना जाता है । वहीं इस शहर को मस्जिदों का शहर भी कहा जाता है । शहर में फ़न तामीर की शाहकार एक नहीं दो नहीं बल्कि हज़ारों मसाजिद हैं जिन के वजूद को देख कर आज भी माहिरीन तामीर हैरत में पड़ जाते हैं जहां तक क़ुतुब शाही मसाजिद-ओ-दीगर क़दीम मसाजिद का सवाल है अक्सर को तारीख़ी विरसा क़रार दिया गया है । ये मसाजिद अपनी तर्ज़ तामीर के लिहाज़ से एक से बढ़ कर एक नज़र आती हैं ।

हैदराबाद की ये ख़ुशक़िसमती है कि यहां की फ़िज़ा में गूंजने वाली अज़ानें माहौल में ग़ैर मामूली रुहानी कैफ़ियत पैदा करती हैं ताहम (फिर भी) मसाजिद की बुलंद-ओ-बाला मीनारें , ख़ूबसूरत गुम्बदों के नूरानी मुनाज़िर और अजानों की रूह प्रवर गूंज मुल़्क दुश्मन अनासिर के ज़हन-ओ-दिल पर गिरां गुज़रते हैं । बहरहाल क़ारईन हैदराबाद की हज़ारों मसाजिद में एक मस्जिद एसी भी है जिसे इस के तर्ज़ तामीर , साख़त (बनावट)और रंग-ओ-रोगन के लिहाज़ से हिंदूस्तान की मुनफ़रिद मस्जिद क़रार दिया जा सकता है । ये तारीख़ी मस्जिद-ए-जामे मस्जिद एवान कहलाती है । जो बेगम पेट ए रिपोर्ट के रूबरू वाक़ै है ।

इस मस्जिद की ख़ूबसूरती-ओ-तर्ज़ तामीर को देखते हुए उसे ना सिर्फ तारीख़ी विरसा में शुमार किया गया है बल्कि उस की इंतिज़ामी कमेटी को अनटाक हेरिटेज एवार्ड 2010 -ए-से भी नवाज़ा गया है । ये तारीख़ी मस्जिद जो एक एकड़ रकबा पर फैली हुई है उसे पाएगाह ख़ानदान से ताल्लुक़ रखने वाले सर विक़ार उल उमरा-, इक़बाल उदवला ने 1890 ता 1900 के अरसा में तामीर करवाया था । ये एस्पेन में मौजूद एक मस्जिद के नक़्शे के मुताबिक़ है और शहर हैदराबाद में अपनी नौइयत की मुनफ़रद मस्जिद है । उसे मस्जिद एक्बालुद्दौला भी कहा जाता है । छुटे निज़ाम बानी मस्जिद नवाब वक़ार अल उमराकी बहुत इज़्ज़त किया करते थे और इन दोनों के दरमियान काफ़ी गहिरा दोस्ताना ताल्लुक़ था ।

नवाब साहिब हमेशा हुज़ूर निज़ाम के हमराह रहते रफीक सफ़र भी रहते , सरोकार अल उमराएक आला ज़ौक़ के मालिक थे और पुर शिकवा इमारात के शौकीन थे । मज़कूरा मस्जिद और कई एक महल जैसे फ़लक नुमा महल , पाएगाह महल ,वक़ार मंज़िल ये सब उन के आला ज़ौक़ के शाहिद हैं । सरोकार अल उमरा को 1894 -ए-ता 1901 के लिये वज़ीर( वुज़रा (मंत्री) ) आज़म मुंतख़ब किया गया था । मीर उसमान जाह बहादुर के मुस्तफ़ी होने के बाद अपने ओहदे पर ख़िदमत अंजाम देते हुए उन्हों ने एस्टेट की भलाई के लिए इस्लाहात को मुतआरिफ़ करवाया । तालीमी शोबा , इंजीनीयरिंग स्कूलस , ला क्लासेस , मजलिस क़ानूनसाज़ , और आसफ़िया लाइब्रेरी इन सब का इफ़्तिताह उन्ही के दौर-ए-हकूमत में हुआ ।

उन्हों ने ये ख़ूबसूरत तरीन मस्जिद अपने यूरोप के दौरे के बाद तामीर करवाई । एस्पेन के कार्ड वया शहर की के थे डोल मस्जिद के अंदाज़ पर उसे तामीर करवाया गया है । ये मस्जिद अपने अंदरून-ओ-बैरून तमाम ख़द्द-ओ-ख़ाल में एस्पेन की मस्जिद के बिलकुल मुशाबेह (की तरह)है । ये मस्जिद अपने ग़ैर मामूली तर्ज़ तामीर के लिये पूरी रियासत में शौहरत रखती है । इस मस्जिद की 17 मीनारें हैं जो मोरेशेस अंदाज़ में बनाए गए हैं ।नीज़ ये वसीअ-ओ-अरीज़ मस्जिद कई कमानों और बड़े हाल पर मुश्तमिल है । इस मस्जिद के मीनार दीगर तमाम मसाजिदों के मीनार से बिलकुल अलग हैं । जो तस्वीर से वाज़ेह है ।

ये मस्जिद अभी भी पाएगाह ख़ानदान के ज़ेर निगरानी है ।जो उस की बेहतर देख रेख कर रहे हैं । कुछ अर्सा क़ब्ल मस्जिद से मुत्तसिल(मिले हुए) कमर्शियल बिल्डिंग की तामीर के लिये बर्मा के ज़रीया चट्टानों को धमाके से उड़ाया जा रहा था जिस से मस्जिद की इमारत काफ़ी मुतास्सिर हुई थी । जब कि हैदराबाद मेट्रो पोलीटन डेवलपमनट अथॉरीटी (HMDA) की जानिब से इस मस्जिद को IIA केटागेरी में रखा गया है ।

इस मस्जिद की ख़ूबसूरती का ताल्लुक़ देखने से है बाशिंदगान हैदराबाद को चाहीए कि कम अज़ कम एक मर्तबा इस मस्जिद का ज़रूर मुशाहिदा करें , ताकि अपने अस्लाफ़ (बुजुरगों)के कारनामे , ख़िदमात और उन की अज़मत हमारे दिलों में हो और हम भी उन के नक़श-ए-क़दम पर चल कर मसाजिद के तहफ़्फ़ुज़ , तामीर और आबाद कारी में पेश पेश रहें ।

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